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गन्ना आवंटन विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट नाराज, चीनी मिलों को लेकर गन्ना आयुक्त को दिए सख्त आदेश

Published: Fri, 11 Sep 2026 12:51 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यदु शुगर लिमिटेड को गन्ना आवंटन में भेदभाव पर गन्ना आयुक्त को सख्त निर्देश दिए हैं, ...और पढ़ें

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HighLights

  1. यदु शुगर को गन्ना आवंटन में भेदभाव पर हाई कोर्ट का फैसला।

  2. 26 साल बाद भूमि आवंटन रद्द करने का आदेश निरस्त किया गया।

  3. 29 साल पुराने हत्या मामले में अभियुक्त को साक्ष्य अभाव में बरी किया।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गन्ना आवंटन में भेदभाव का आरोप लगाने वाली बदायूं की यदु शुगर लिमिटेड के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने गन्ना आयुक्त को पेराई सत्र 2026-27 में मिल की स्थापित क्षमता के अनुसार गन्ना आवंटित करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने कंपनी की याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा, कल्याणकारी राज्य की नीति ऐसी होनी चाहिए जो मौजूदा मिलों को बचाए और नए मिलों के लिए रास्ता भी खोले।

यदु शुगर लिमिटेड की मिल सुजानपुर-बिसौली में है। इसकी स्थापित पेराई क्षमता 7000 टन प्रतिदिन है। कंपनी के अनुसार गन्ना आयुक्त द्वारा 15 अक्टूबर 2020 और 14 अक्टूबर 2025 के कार्यालय ज्ञापनों में पांच वर्षों 2025-2030 के लिए उसकी अनुमानित गन्ना आवश्यकता 100.80 लाख क्विंटल तय की गई है, लेकिन उसे कभी भी पर्याप्त गन्ना आवंटित नहीं किया गया।

याची के अधिवक्ता दीप्तिमान सिंह ने कहा कि पिछले 10 वर्षों में अनुमानित आवश्यकता में कोई कमी नहीं हुई, फिर भी कम आवंटन के कारण मिल का ड्राल प्रतिशत गिर गया और उसे चार-पांच साल से घाटा उठाकर बंद करना पड़ा।

उन्होंने राज्य द्वारा दाखिल चार्ट का हवाला देते हुए भेदभाव का आरोप लगाया। उनके अनुसार प्रदेश की आठ मिलों में सात मिलों को अनुमानित आवश्यकता से 100 प्रतिशत से अधिक गन्ना मिला। जैसे मझौली को 190.92 प्रतिशत राजपुरा को 186.87 प्रतिशत, जबकि यदु शुगर को सिर्फ 50.89 प्रतिशत ही आवंटन हुआ। गन्ने की कमी के कारण 2025-26 में मिल की 784.44 घंटे ही पेराई हो सकी, जबकि 786.19 घंटे गन्ना न मिलने से बर्बाद हुए। राज्य की ओर से कहा गया कि भुगतान में देरी और कम ड्राल, आवंटन में कमी की वजह है।

पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने माना कि यदु शुगर के साथ भेदभाव हुआ है। कहा, राज्य का कर्तव्य है कि अनुमानित आवश्यकता के अनुरूप आवंटन कर मिल को चलने योग्य बनाए। अदालत ने गन्ना आयुक्त को निर्देश दिया कि 2026-27 सत्र के लिए यदु शुगर को 100.80 लाख क्विंटल की अनुमानित आवश्यकता और 40 प्रतिशत क्षति को ध्यान में रखते हुए क्षमता के अनुसार गन्ना आवंटित करें। पेराई कैलेंडर इस तरह बने कि 180 दिन तक लगातार आपूर्ति हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि मिल को आवंटित गन्ना खरीदकर किसानों को समय से भुगतान सुनिश्चित करना होगा।

खेती के लिए जमीन आवंटन 26 साल बाद रद करने वाले आदेश पर रोक

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खेती के लिए 26 साल पहले जमीन के आवंटन को अवैध करार देते हुए रद करने वाला आदेश निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने अधिकारियों को आवंटी के नाम खतौनी ठीक करने का निर्देश भी दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति चंद्र कुमार राय की एकलपीठ ने भूरेय सिंह की याचिका स्वीकार करते हुए दिया है।

याची के पिता को फरवरी 1987 को परिवार नियोजन योजना में भागीदारी के कारण हाथरस के गाटा संख्या 624 की भूमि खेती के लिए मिली थी। पहले इसे बंजर दर्ज किया गया था। बाद में याची के पिता का नाम अभूमिधर से चलकर अभूमिधर संक्रमणीय अधिकारों के साथ दर्ज कर दिया गया। निजी शिकायत पर 26 साल बाद पांच अगस्त 2013 को यूपी जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम की धारा 198(4) के तहत निरस्तीकरण की कार्रवाई शुरू हुई।

कलेक्टर हाथरस ने पहली जुलाई 2015 को आवंटन रद कर दिया। इसके खिलाफ दाखिल पुनरीक्षण अपर आयुक्त अलीगढ़ ने 29 अगस्त 2016 को खारिज कर दी। हाई कोर्ट में याची के वकील ने कहा कि इतने लंबे समय बाद निरस्तीकरण की कार्रवाई गलत है। राज्य सरकार ने कहा कि भूमि खलिहान के रूप में दर्ज थी, इसलिए आवंटन ही गलत था।

कोर्ट ने याची के पक्ष में दिए गए 2018 के ऋषिपाल और जितेंद्र कुमार के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि समयबाधित निरस्तीकरण नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कलेक्टर व अपर आयुक्त का आदेश रद करते हुए अधिकारियों को गाटा संख्या 624 का नाम याची के पक्ष में तत्काल ठीक करने का निर्देश दिया।

जूनियर असिस्टेंट भर्ती: विवादित प्रश्नों पर सुनवाई 22 को

प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 3284 पदों की जूनियर असिस्टेंट भर्ती 2024 के विवादित प्रश्नों के मामलों पर अगली सुनवाई के लिए 22 सितंबर की तारीख निर्धारित की है। यह आदेश न्यायमूर्ति दिनेश पाठक ने दिया है। याची के अधिवक्ता संजय कुमार यादव ने कोर्ट को बताया कि जूनियर असिस्टेंट भर्ती में अधीनस्थ सेवा चयन आयोग द्वारा प्रोविजनल उत्तर कुंजी दो फरवरी को जारी की गई थी।

इस उत्तर कुंजी में तीन प्रश्नों के उत्तर को संशोधित उत्तर कुंजी में बदल दिया गया, जो प्रमाणित पुस्तक एवं साक्ष्य के आधार पर सही नहीं है। अभ्यर्थियों का आरोप है कि आयोग ने जो उत्तर प्रोविजनल उत्तर कुंजी में स्वीकार किए थे, उन्हें संशोधित उत्तर कुंजी में बदल दिया।

कोर्ट ने अधीनस्थ सेवा चयन आयोग को इन विवादित प्रश्नों पर सभी याचिकाओं में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। विवादित दो प्रश्न हिंदी के (निरोग व प्रसाद) और एक प्रश्न कंप्यूटर से संबंधित यूपीआई वाला है।


टेंडर में आवश्यक दस्तावेज आनलाइन अपलोड न करने पर एलओआइ रद

प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने टेंडर प्रक्रिया में आवश्यक दस्तावेजों के आनलाइन अपलोड न होने को गंभीर प्रक्रिया उल्लंघन मानते हुए प्रतिवादी संख्या सात के पक्ष में जारी लेटर आफ इंटेंट (एलओआइ) को रद कर दिया है। न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने बस्ती की मेसर्स ओम साई ट्रेडर्स व अन्य की याचिका पर यह आदेश दिया है।

सुनवाई के दौरान वितरण कंपनी ने बताया कि प्रतिवादी संख्या सात के पक्ष में एलओआइ जारी की जा चुकी है। याचीगण ने आपत्ति जताई कि टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह से आनलाइन थी। कोर्ट ने टेंडर दस्तावेज का अवलोकन करते हुए पाया कि टेंडर प्रोफार्मा की धारा-1 में सभी दस्तावेजों का अपलोड करना अनिवार्य था। कोर्ट ने माना कि प्रतिवादी संख्या सात के मामले में आवश्यक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

हालांकि, आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि कौन-सा विशिष्ट दस्तावेज आनलाइन अपलोड नहीं किया गया था। हाई कोर्ट ने प्रतिवादी संख्या सात मेसर्स साई ट्रेडिंग कंपनी आजाद नगर बांसी के पक्ष में जारी एलओआइ को निरस्त करते हुए यूपी पावर कारपोरेशन लिमिटेड को शेष बोलियों का मूल्यांकन कर सफल बोलीदाता के पक्ष में नई एलओआइ जारी करने का निर्देश दिया। याचिका निस्तारित कर दी गई है।

हाई कोर्ट ने 29 साल पुराने हत्या मामले में उम्रकैद का फैसला पलटा

लखनऊ। करीब 29 साल पुराने हत्या के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने जिला अदालत के उम्रकैद के फैसले को पलटते हुए अभियुक्त सांभर चाई को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन का पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था, लेकिन ऐसी परिस्थितियों की पूरी और विश्वसनीय कड़ी पेश नहीं की जा सकी, जिससे अभियुक्त का अपराध संदेह से परे साबित हो। न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्र की पीठ ने यह फैसला सुनाया।

मामला बहराइच के हुजूरपुर थाने में वर्ष 1997 में दर्ज मुकदमे से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार रामबहोर 20 फरवरी 1997 को लापता हुआ था। आरोप था कि सांभर चाई समेत अन्य आरोपितों ने गला दबाकर उसकी हत्या कर दी और शव नदी किनारे रेत में दफना दिया। घटना के करीब 26 दिन बाद 19 मार्च को एफआइआर दर्ज की गई और अगले दिन शव बरामद हुआ।

पोस्टमार्टम में मौत का कारण गला दबाना बताया गया था। विचारण अदालत ने सांभर चाई को हत्या और साक्ष्य मिटाने के आरोप में उम्रकैद समेत अन्य सजा सुनाई थी। हालांकि, अन्य सहआरोपितों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया था। इसके बाद सांभर चाई ने हाई कोर्ट में अपील दाखिल कर सजा को चुनौती दी।

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पीठ ने पाया कि अभियोजन का प्रमुख आधार अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति थी। यह बात गवाह बुद्धिसागर ने बताई थी, जो शिकायतकर्ता का बहनोई था। कोर्ट ने कहा कि अभियुक्त और गवाह के बीच ऐसा कोई संबंध या विश्वास का आधार सामने नहीं आया, जिससे करीब एक माह बाद अभियुक्त द्वारा उसके सामने अपराध स्वीकार करने की बात विश्वसनीय लगे।

शव बरामदगी को लेकर भी कोर्ट ने अभियोजन के साक्ष्यों को कमजोर माना। विधिवत बरामदगी मेमो प्रस्तुत नहीं किया गया और विवेचक अदालत में गवाही देने नहीं आया। पुलिस दस्तावेज हेड कांस्टेबल के माध्यम से द्वितीयक साक्ष्य के तौर पर साबित कराए गए।

पीठ ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के मामले में सभी कड़ियां इतनी मजबूत होनी चाहिए कि अभियुक्त की निर्दोषता की कोई उचित संभावना न बचे। इस मामले में स्वीकारोक्ति और शव बरामदगी दोनों विश्वसनीय रूप से साबित नहीं हुए।

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अभियुक्त के खिलाफ हत्या का स्पष्ट उद्देश्य भी स्थापित नहीं किया जा सका। इन आधारों पर हाई कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और सांभर चाई को किसी अन्य मामले में निरुद्ध न होने पर तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।