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    Allahabad High Court : कैपिंग प्रणाली पर रज्जू भैया राज्य विश्वविद्यालय से मांगा स्पष्टीकरण, छात्र की याचिका पर निर्देश

    By Suresh pandey Edited By: Brijesh Srivastava
    Updated: Sat, 18 Jul 2026 08:53 PM (IST)

    इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रज्जू भैया राज्य विश्वविद्यालय से कैपिंग प्रणाली पर स्पष्टीकरण मांगा है, जहां एक छात्र को थीसिस में 97 अंक मिलने के बावजूद ऑनलाइ ...और पढ़ें

    इलाहाबाद हाई कोर्ट।

    इलाहाबाद हाई कोर्ट।

    HighLights

    1. थीसिस में 97 अंक पाने के बावजूद छात्र को नुकसान

    2. इस प्रकरण में अगली सुनवाई हाई कोर्ट में 21 जुलाई को 

    विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कैपिंग प्रणाली पर प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) राज्य विश्वविद्यालय प्रयागराज से स्पष्टीकरण मांगा है। छात्र सहर्ष सिंह ने इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए याचिका दायर की है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने निर्देश दिया है कि प्रथमदृष्टया इस भेद का औचित्य यूनिवर्सिटी को स्पष्ट करना होगा। प्रकरण में अगली सुनवाई 21 जुलाई को दोपहर दो बजे होगी।

    याची का तर्क 

    याची के अनुसार उसने थीसिस मूल्यांकन में 97 अंक प्राप्त किए, लेकिन यूनिवर्सिटी का ऑनलाइन सिस्टम 85 प्रतिशत से अधिक अंक दर्ज करने की अनुमति नहीं देता। इस कारण उसे 36 ग्रेड पॉइंट्स का नुकसान उठाना पड़ रहा है। याची का तर्क है कि 85 प्रतिशत अंकों की यह सीमा (कैपिंग) केवल संबद्ध कॉलेजों पर लागू होती है, न कि उन छात्रों पर जो सीधे विश्वविद्यालय के अंतर्गत पढ़ाई करते हैं। 

    रावि के अधिवक्ता को निर्देश

    कोर्ट ने 14 जुलाई को हुई सुनवाई में प्रतिवादी प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) राज्य विश्वविद्यालय की ओर से पेश अधिवक्ता प्रतीक चंद्रा को निर्देश दिया कि वे अगली सुनवाई तक अकादमिक परिषद की उस बैठक का ब्योरा पेश करें जिसमें यह नीति तय हुई थी। परिषद के सदस्यों की संख्या और उनकी योग्यता का भी विवरण भी कोर्ट ने मांगा है।

    मार्किंग प्रणाली पर याची ने उठाए सवाल 

    याची के अनुसार मार्किंग प्रणाली मनमानी तथा मेधावी छात्रों के साथ भेदभाव करने वाली है। याचिका में 16 जुलाई 2026 के दीक्षा समारोह का भी उल्लेख है। याची के अनुसार अगर कोर्ट के अंतिम फैसले में मार्किंग प्रणाली अवैध पाई जाती है और छात्रों के अंक बदलते हैं तो पदक विजेताओं की सूची भी प्रभावित होगी। पदक वितरण की निष्पक्षता और वैधता पर भी सवाल उठ सकते हैं।

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