यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 08, 2020 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
रिश्तों में भावनात्मक जुड़ाव सबसे महत्वपूर्ण
मित्रों आज के इस भौतिकता वादी युग में जीवन के हर आयाम में भावनाओं व रिश्तों का महत्व लगातार कम ...और पढ़ें

पीलीभीत : मित्रों आज के इस भौतिकता वादी युग में जीवन के हर आयाम में भावनाओं व रिश्तों का महत्व लगातार कम होता जा रहा है, जिसकी वजह से रिश्ते भी नाममात्र के रह जाते हैं। जब तक हम रिश्तों में भावनात्मक रूप से नहीं जुड़े हैं, तब तक उस रिश्ते का कोई महत्व नहीं है। भावनात्मक रूप से जुड़ने के बाद जब हमें किसी संबंधी की जरूरत होती है तो वह तन, मन तथा धन से हमारे साथ जुड़ता है। भावनात्मक रूप से जुड़े रहने का यह सिद्धांत रिश्तों के अलावा भी जीवन के हर क्षेत्र में होता है।
शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े होने के कारण मैं यह मानता हूं कि शिक्षा जगत में विशेष रूप से स्कूलों में जहां भविष्य के नागरिकों की नींव रखी जाती है, उन मासूम अनगढ़े बच्चों को एक अच्छा नागरिक बनाने के लिए उन्हें शिक्षकों, अभिभावकों, समाज एवं प्रकृति से भावनात्मक रूप से जुड़ना होगा। यदि बच्चे शिक्षकों से भावनात्मक रूप से जुड़े होंगे तो उनकी अनुकरणीय बातों और आदतों का अनुकरण करेंगे अन्यथा उदंड और शरारती हो जाएंगे। यदि बच्चे अभिभावकों से भावनात्मक रूप से जुड़े होंगे तो उनमें अपने माता पिता के प्रति समर्पण का भाव विकसित होगा। उन्हें अभिभावकों की ओर से किए गए प्रयासों का बोध होगा, जिससे बच्चे मन से उनका सम्मान करेंगे। यह व्यवहार माता-पिता के लिए भी अत्यंत उत्साहित करने वाला होगा। माता-पिता को भी बच्चों को डांटने से बचना चाहिए , उन्हें समझते हुए उनकी समस्याओं का निराकरण करना चाहिए। यही बात समाज पर भी लागू होती है। भावनात्मक रूप से जुड़े होंगे तो समाज की समस्याओं को अपनी समस्या समझकर उन पर चितन करेंगे। भविष्य में उन्हीं विद्यार्थियों में से अच्छे वक्ता एवं समर्पित नेता समाज को मिलेंगे। जो समाज, प्रदेश एवं देश के कल्याण को ही अपना उद्देश्य मानेंगे। समाज के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ना ही समस्त समस्याओं का समाधान है। हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम के देशभक्त, नौजवान भावनात्क रूप से देश के साथ जुड़े थे। यही कारण था कि उन्हें देश के लिए बलिदान देने में किसी तरह की कठिनाई नहीं हुई। देश के लिए हंसते हंसते अपनी जान कुर्बान कर दी। यदि बच्चे और नागरिक प्रकृति से भावनात्मक रूप से जुड़े होंगे, तो उन्हें प्रकृति माता समान दिखाई देगी। वे प्रकृति का सम्मान और सुरक्षा माता के समान करेंगे। हमारे देश में चिपको आंदोलन इस बात की मिसाल रहा है। गढ़वाल के लोगों ने व्यक्तिगत हितों के ज्यादा महत्व प्रकृति को दिया। चिपको आंदोलन के तहत गौरा देवी एवं सुंदरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में पेड़ों को बचाने के लिए गांव के लोग पेड़ों से चिपक गए। ठेकेदारों को पेड़ नहीं काटने दिए। यह उनकी संकल्प शक्ति का ही परिणाम था कि अपने जंगल के पेड़ों को बचा पाए। इतिहास में भी अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखवा दिया। इसी प्रकार राजस्थान की विश्नोई जाति भी प्रकृति को ईश्वर का रूप मानती है। रक्षा के लिए वे लोग अपनी जान की बाजी भी लगा देते हैं। इस जाति की प्रमुख अमृता देवी विश्नोई ने पेड़ काटने को लेकर दी गई राजाज्ञा का उल्लंघन करते हुए 1970 में अपनी दो बेटियों समेत स्वयं और अपनी बहू की जान कुर्बान कर दी, परंतु पेड़ नहीं कटने दिए। इससे प्रेरणा लेकर सरकार ने अमृता देवी विश्नोई अवार्ड की घोषणा की। यह प्रकृति की सुरक्षा में लगे पर्यावरणविदों को दिया जाता है। हमारे शास्त्र भी हमें प्रकृति को माता का स्वरूप मानकर इसकी सेवा और सुरक्षा की प्रेरणा देते हैं। भावनात्मक रूप से प्रोत्साहन धार्मिक रूप से भी मिलता है। अत: हम यह कह सकते हैं कि बिना भावनात्मक रूप से जुड़े किसी भी क्षेत्र में वास्तविक सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती। हम अपने माता-पिता या करीबी रिश्तेदारों से अक्सर अपने मन की वे सभी बातें करते हैं, जिन्हें हम अन्य व्यक्तियों से नहीं कर सकते। हम उनसे भावनात्मक, मानसिक व आर्थिक रूप से जुड़े होते हैं। रिश्तेदार व परिवार व्यक्ति के साथ बुरे समय में खड़े होते हैं तब एक अकेले व्यक्ति की पीड़ा पूरे परिवार और रिश्तेदारों की पीड़ा बन जाती है। एकजुट होकर मुसीबत से लड़ते हैं। अपनी मुसीबत को भगाकर कामयाबी पाते हैं। कैलीफोर्निया में हुए शोध के अनुसार जिन लोगों का परिवार सामाजिक एवं भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ नहीं होता या कम होता है, उनमें दिल की बीमारियों और रक्तसंचारण की समस्याओं के खतरे बढ़ जाते हैं। वहीं दूसरी ओर जिन लोगों के दोस्त और परिवार भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं, वे जल्दी बीमार नहीं होते हैं। उनका स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है और आयु भी लंबी होती है। दोस्त, रिश्तेदार और परिवार दवा भी बन जाते हैं। इसके लिए व्यक्ति को प्रेम व विनम्रता एवं भावनात्मक रूप से जुड़े रहना जरूरी है। यह भी सर्वविदित है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने व्यक्तिगत एवं व्यवसायिक जीवन में तभी सफलता अर्जित कर सकता है , जब वह अन्य व्यक्तियों से भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ हो, तभी उसके घर एवं व्यवसाय का प्रत्येक व्यक्ति मन लगाकर काम करेगा। प्रतिष्ठान की सफलता के लिए अमूल्य योगदान देगा। एक छोटी सी कहानी याद आ गई है। एक खेत में कुछ मजदूर निराई गुड़ाई का काम कर रहे थे। एक घंटा काम करने के बाद वे सब बैठकर सुस्ताने और बातचीत करने लगे। खेत के मालिक ने उनसे कहा कुछ नहीं, खुद खुरपी लेकर काम करने लगा। मजदूरों ने स्वामी को काम करते देखा तो सरमा गए और दौड़कर काम में जुट गए। दोपहर हुआ तो स्वामी मजदूरों के पास गया और बोला, भाइयों काम बंद कर दो और खाना खा लो तथा आराम कर लो। मजदूर खाना खाने चले गए और शीघ्र ही थोड़ा आराम करने के बाद काम पर डट गए। शाम को छुट्टी के समय पड़ोसी खेत वाले ने देखा कि उसका काम उससे दो गुना हुआ है। वह बोला, भाई तुम मजदूरों को छुट्टी भी देते हो और डांटते फटकारते भी नहीं, तब भी तुम्हारा काम मुझसे ज्यादा होता है। जबकि मैं मजदूरों को छुट्टी नहीं देता। हर समय डांटता फटकारता भी रहता हूं। स्वामी बोला, भैया काम लेने के लिए काम लेने की नीति में मैं सख्ती से अधिक सहानुभूति एवं भावनात्मक संबंध को पहला स्थान देता हूं, इसीलिए मजदूर पूरा मन लगाकर काम करते हैं। इससे काम ज्यादा भी होता है और अच्छा भी। उपरोक्त कहानी से स्पष्ट है कि यदि कोई व्यक्ति अपने कार्य क्षेत्र के कर्मचारियों का दिल जीत लेता है और सभी लोग हमेशा एक दूसरे की दिल लगाकर मदद करने के लिए तैयार रहते हैं। इंसानों को पशुओं से इन संबंधों की प्रेरणा लेनी चाहिए, क्योंकि पशु भी अपने मालिक के साथ भावनात्मक रूप से जुडे़ होते हैं। अपने प्यार करने के विभिन्न तरीकों से इस संबंध को प्रकट करते हैं। पेड़ पौधे भी भावनात्मक संबंध को समझते हैं। दक्षिण अफ्रीका में यदि पेड़ को सुखाना हो तो सभी कबीले वाले पेड़ को चारों ओर एकत्र होकर कोसते हैं। गालियां देते हैं। कुछ समय में पेड़ सूख जाता है। यह उदाहरण दर्शाता है कि पेड़ पौधे भी भावनाओं को समझते हैं। उनके प्रति प्रतिक्रिया देते हैं। हमारे देश की आत्मा कहे जाने वाले धार्मिक ग्रंथ रामायण से बहुत प्रेरणा मिलती है। इसमें सभी लोग प्रभु श्रीराम के नेतृत्व से प्रभावित थे। वे उनसे अत्यंत प्रेम करते थे। यही कारण था कि उनके एकमात्र आह्वान से सभी वानर भी अपनी जान की परवाह किए बिना माता सीता की खोज में लग गए । भगवान श्री राम का भावनात्मक रूप से जुड़ाव के साथ उत्कृष्ट नेतृत्व ही इसका मुख्य आधार था। अंत में हम कह सकते हैं कि भावनात्मक रूप से जुड़ना वास्तविक योग है। यह एकता, सहिष्णुता एवं राष्ट्र भक्ति विकसित करने की कुंजी है। किसी देश और समाज से भावनात्मक रूप से जुड़ा व्यक्ति अपने देश की भलाई के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। हमें भावनात्मकता के मूल सिद्धांत को समझते हुए इसका प्रयोग भावी पीढ़ी के उत्थान के लिए करना चाहिए।
-रमेश चंद्र सेमवाल, प्रधानाचार्य लायंस बाल विद्या मंदिर सीनियर सेकेंडरी स्कूल पीलीभीत
