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मां की पुरानी साड़ी से बनाया वॉल आर्ट! 58 की उम्र में इस महिला ने शुरू किया अनोखा स्टार्टअप

Published: Sat, 24 Oct 2026 05:00 AM (IST)

मुरादाबाद की डा. नीलिमा चौहान 58 वर्ष की उम्र में पुराने कपड़ों और कतरनों को टेक्सटाइल आर्ट में बदलकर नई ...और पढ़ें

डाॅ. नीलिमा के साथ कपड़ों की कतरन जोड़ती महिलाएं और प्रदर्शनी में अपने उत्पादों के साथ डाॅ. नीलिमा चौहान

डाॅ. नीलिमा के साथ कपड़ों की कतरन जोड़ती महिलाएं और प्रदर्शनी में अपने उत्पादों के साथ डाॅ. नीलिमा चौहान

HighLights

  1. 58 की उम्र में चुनी नई राह, मां की साड़ी और दादी के लहंगे को दे रहीं वाल आर्ट का रूप

रजनी मेहता, मुरादाबाद। अपनों की यादों को सहेजने के लिए तस्वीरें और उनकी दी हुई चीजें अक्सर संभालकर रखी जाती हैं, लेकिन किसी अपने के पहने कपड़े को कलाकृति में बदल दिया जाए तो उसकी यादें हमेशा आंखों के सामने रह सकती हैं। इसी सोच के साथ प्रकाश एन्क्लेव निवासी डाॅ. नीलिमा चौहान टेक्सटाइल आर्ट के जरिए पुराने कपड़ों को नई पहचान दे रही हैं।

मां की साड़ी, दादी के लहंगे और प्रियजनों के परिधानों को वाल आर्ट समेत सजावटी उत्पादों में बदलने की उनकी पहल भावनाओं को कला से जोड़ रही है। 58 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी रुचि को नई राह दी है।

मूलरूप से धामपुर के पास मटौरा दरगा गांव की रहने वाली नीलिमा ने प्रारंभिक पढ़ाई मटौरा मान गांव के पास से की। माध्यमिक शिक्षा बसेड़ा खुर्द से और इंटरमीडिएट पंतनगर से पूरा किया।

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पंतनगर विश्वविद्यालय से गृह विज्ञान में बीएससी करने के बाद मुरादाबाद के दयानंद कालेज से बीएड किया। शिक्षण कार्य के दौरान उनकी शादी नरेश कुमार से हुई।

पति के सहयोग से उन्होंने विद्यालय संचालन भी शुरू किया। करीब 24 वर्ष तक शिक्षण कार्य करने के बाद 2014 में अंग्रेजी विषय से परास्नातक की पढ़ाई पूरी की।

कोरोना काल में विद्यालय संचालन बंद करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और 2024 में पीएचडी पूरी की। वर्तमान में वह हिंदी विषय में परास्नातक की पढ़ाई कर रही हैं।

कपड़ों की कलाकृति बन गई राजलीला की पहचान

नीलिमा वर्ष 2002 से 2021 तक गंगा देवी गर्ल्स इंटर कालेज में प्रधानाचार्य रहीं। शिक्षा के क्षेत्र में लंबे समय तक जिम्मेदारी निभाने के बाद कोरोना काल में विद्यालय संचालन प्रभावित हुआ तो उन्होंने अपनी रुचि को समय देना शुरू किया।

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माता-पिता के निधन के बाद उनकी यादों को सहेजने के लिए अपने पास पर्याप्त स्मृतियां और निशानियां न होने का अहसास उन्हें सालता रहा। इसी अनुभव से उन्हें विचार आया कि ऐसे कई लोग होंगे, जो अपने माता-पिता या दादा-दादी के पुराने कपड़ों को यादगार के रुप में संजोना चाहते होंगे।

यहीं से कपड़ों को कलाकृति में बदलने की सोच ने आकार लिया। उन्होंने इस पहल को राज-लीला यानि अपने पिता राजपाल सिंह और माता लीला देवी के नाम से शुरु किया।

कतरनों से तैयार कर रहीं कलाकृतियां

नीलिमा मंगल और रविवार को लगने वाले बाजारों से स्क्रैप फैब्रिक यानी कपड़ों की बची हुई कतरनें जुटाती हैं। रंग, बनावट और डिजाइन के अनुसार इनका इस्तेमाल कर सजावटी उत्पाद तैयार करती हैं। उनके साथ वर्तमान में आठ महिलाएं काम कर रही हैं।

खास बात यह है कि ग्राहकों के लिए मां की साड़ी, नानी-दादी के परिधान जैसे भावनात्मक महत्व रखने वाले कपड़ों को भी कलाकृति में बदला जा सकता है।

हाल की प्रदर्शनी के दौरान उन्हें ऐसे उत्पाद तैयार करने के आर्डर भी मिले हैं। इनमें चांदी के वर्क वाली साड़ी और नानी-दादी की साड़ियों से कलाकृतियां बनाने की मांग शामिल है।

प्रदर्शनियों में पहुंच रही कला

नीलिमा 21 अगस्त को नोएडा के अरुण विहार कम्युनिटी फेस्ट में अपने सात उत्पाद प्रदर्शित कर चुकी हैं। 16 अक्टूबर को गुरुग्राम में आयोजित कार्यक्रम में भी उन्होंने उत्पाद प्रदर्शित करने की तैयारी की थी।

अब 25 और 26 अक्टूबर से शुरु होने वाले आयोजनों में अपनी कलाकृतियां प्रदर्शित करने की योजना है। टेक्सटाइल आर्ट के साथ वह घर पर जैविक खाद भी तैयार करती हैं।

उनका प्रयास पुराने कपड़ों और बची हुई कतरनों का रचनात्मक इस्तेमाल कर कम अपशिष्ट में उपयोगी और आकर्षक वस्तुएं बनाना है। नीलिमा की पहल बताती है कि नई शुरुआत के लिए उम्र बाधा नहीं होती। सही सोच और लगन से पुरानी चीजों को यादगार कलाकृति में बदला जा सकता है।

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