मीरजापुर में पद्मश्री उर्मिला श्रीवास्तव के साथ पांच सौ से अधिक महिलाओं के कजरी के सुरों में सजा सावन
मीरजापुर के चुनार में सुरभि शोध संस्थान और संस्कार भारती द्वारा कजरी महोत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें पद्मश्री उर्मिला श्रीवास्तव के साथ पांच सौ से अ ...और पढ़ें

मीरजापुर में पद्मश्री उर्मिला श्रीवास्तव और पांच सौ महिलाओं ने कजरी के सुरों से सजाया सावन महोत्सव।
HighLights
चुनार, मीरजापुर में कजरी महोत्सव का भव्य आयोजन।
पद्मश्री उर्मिला श्रीवास्तव ने लोकगीतों से समा बांधा।
पांच सौ से अधिक महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में दी प्रस्तुति।
जागरण संवाददाता, चुनार (मीरजापुर)। योगीराज भर्तृहरि की नगरी चुनार में सावन की हरियाली के बीच रविवार को सुरभि शोध संस्थान व संस्कार भारती के सहयोग से कजरी महोत्सव का आयोजन किया गया। पद्मश्री उर्मिला श्रीवास्तव के स्वरों का साथ जब एक साथ पांच सौ से अधिक महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में दिया तो पूरा सुरभि परिसर लोकगीतों के सुरों से गूंज उठा।
करीब चार घंटे तक चली कजरी के इस सुरमयी आयोजन में लोक गायन की जीवंत परंपरा ने सावन के उल्लास को बढ़ाया जिसमें कजरी के स्वर और लय पर श्रोताओं का मन मयूर नाच उठा। आयोजन में पद्मश्री ने कजरी की विभिन्न विधाओं और शास्त्रीय गायन की समृद्ध परंपरा से लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
सावन की रिमझिम, विरह की कसक, मिलन की आस और गांव-गिरांव की सहज भावनाएं गीतों में उतरती रहीं। मंच से उठती हर तान जैसे पूर्वांचल की माटी की सोंधी महक और लोकजीवन की स्मृतियों को जीवंत कर रही थी। पूर्वाेत्तर भारत की लोक संस्कृति की भी इस महोत्सव में मनोहारी छटा दिखाई दी।

सिक्किम, नागालैंड, असम, मिजोरम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर और नेपाल की छात्राओं ने विभिन्न लोकनृत्यों की प्रस्तुति देकर दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
विविध संस्कृतियों के रंगों से सजा मंच भारत की सांस्कृतिक एकता का जीवंत प्रतिबिंब नजर आया। पद्मश्री उर्मिला श्रीवास्तव ने अपने चिर-परिचित अंदाज में मीरजापुरी कजरी से शुरुआत की तो श्रोता भी सुर में सुर मिलाते नजर आए।
उन्होंने सेजिया पे लोटे काला नाग हो..., कचौड़ी गली सून बलमू..., मीरजापुर कईले गुलजार हो, कचौड़ी गली सून बलमू... जैसे लोकप्रिय कजरी गीतों से वातावरण को लोक रंग में रंग दिया।
घिर-घिर बरसी सावन रस बूंदिया, कि आई गईलै ना अब बरखा बहार... से लेकर लखनऊ की प्रसिद्ध कजरी नन्हीं-नन्हीं बूंदियां रे, सावन का मेरा झूलना... तक सावन की विविध छवियां गीतों में उतरती रहीं। सावन भावै चटक चुनरिया, बिरना लईके आवे ना... ने भाई-बहन के स्नेह को स्वर दिया। बदरिया बरसै, श्याम नहीं आए, पहली बदरिया बगिया में बरसे... सुनाया तो श्रोता भावविभोर हो उठे।
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इसके बाद कैसे खेले जईबू सावन में, कजरिया बदरिया घेरे आई ननदी..., हमकै सावन में झुलनी में गढ़ाई दा पिया, जिया बहलाय दा पिया ना..., बरसन लागी सावन बदरिया, पिया बिन लागी न मोरी अखियां... जैसे गीतों ने सावन के श्रृंगार और विरह दोनों पक्षों को स्वर दिया। तरसैला जियरा हमार हो नइहरै में... जैसे लोकगीतों में मायके की स्मृतियां, बिछोह की पीड़ा और नारी मन की सहज अभिव्यक्ति सुनाई दी।
महोत्सव में राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के उपाध्यक्ष सोहन लाल श्रीमाली, सुरभि के ट्रस्टी सूर्यकांत जालान, रेणु जालान, श्रवण करवा, कजरी गायिका ममता शर्मा, माया दीदी, सविता सिंह, आरएसएस के विभाग प्रचारक कौशल किशोर, जिला प्रचारक धनंजय, अमरनाथ शुक्ल, रमेश कुमार बंसल, प्रधानाचार्य डा. एनके पांडेय, श्रुति भूषण मिश्र, विवेक सिंह, श्यामधर चतुर्वेदी, दीपक सिंह, अमित चतुर्वेदी आदि उपस्थित रहे।