गन्ने की 'सुपर किस्म' विकसित करने में जुटे विज्ञानी, शाहजहांपुर गन्ना शोध परिषद ने तैयार किए रोगरोधी बीज
गन्ने की CO-0238 प्रजाति में रेड रॉट बीमारी के प्रकोप ने कृषि विज्ञानियों को चिंतित किया है, जो अत्यधिक निर्भरता ...और पढ़ें

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।
HighLights
CO-0238 प्रजाति में रेड रॉट बीमारी का प्रकोप बढ़ा।
शाहजहांपुर के वैज्ञानिकों ने रोगरोधी बैक्टीरियल स्ट्रेन पहचाने।
नई उन्नत किस्में विकसित, पर पैदावार का भरोसा अभी कम।
जागरण टीम, मेरठ। कभी गन्ना किसानों की पसंदीदा प्रजाति रही सीओ-0238 के पतन ने कृषि विज्ञानियों और अनुसंधान संस्थानों के सामने एक ही प्रजाति पर अत्यधिक निर्भरता (मोनोकल्चर) के खतरों को उजागर कर दिया है। विज्ञानियों का स्पष्ट मानना है कि बीमारी के बढ़ते प्रकोप का मुख्य कारण खेतों में प्रजातीय विविधता का न होना था।
हालांकि, गन्ना विकास विभाग के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर सीओ-0238 के बड़े क्षेत्र को तेजी से दूसरी किस्मों से बदलना तो दूसरी ओर नई किस्म ऐसी होनी चाहिए जो किसान को उपज और चीनी रिकवरी में नुकसान न दे।
शाहजहांपुर स्थित गन्ना शोध परिषद के विज्ञानियों ने रेड राट नियंत्रण की दिशा में दो उपयोगी बैक्टीरियल स्ट्रेन स्टेनोट्रोफोमोनास माल्टोफिलिया बी-2132 और स्यूडोमोनास स्टटजेरी बी-2133 की पहचान भी की है। इनके माध्यम से रोगरोधी बीज तैयार कर प्रदेश के गन्ना उत्पादक 48 जिलों में किसानों तक पहुंचाने की योजना है।
गन्ना शोध संस्थानों ने सीओ-0238 के विकल्प के रूप में कई अगेती और उन्नत किस्में तैयार की हैं, जिनकी संभावित उपज 900 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक आंकी गई है। गन्ना शोध परिषद ने विकल्प के तौर पर कोशा-13235, कोशा-18231, कोशा-17231 और कोशा-19231 जैसी अगेती प्रजातियां विकसित की हैं। वैज्ञानिकों का दावा है कि इनकी उत्पादन क्षमता सीओ-0238 के बराबर है, हालांकि किसानों के बीच इनका भरोसा और विस्तार बढ़ाना बाकी है। लखनऊ संस्थान की लख-14201 और कोलख-16202 भी विकल्प के रूप में उपलब्ध हैं।
मेरठ मंडल और आसपास के जिलों में किसान अब सीओ-0238 के स्थान पर अन्य प्रजातियों को खेतों में जगह दे रहे हैं। इनमें कोशा-0118, कोशा-14098, कोशा-15023, कोशा-9709 और कोशा-5011 प्रमुख हैं। किसान मानते हैं कि नई प्रजातियां अभी तक सीओ-0238 जैसी स्थिर पैदावार और रिकवरी का भरोसा नहीं दे सकी हैं। वर्तमान में भी कई इलाकों में इस प्रजाति का हिस्सा 30 से 40 प्रतिशत तक बना हुआ है।
किसी प्रजाति में वो पैदावार नहीं
बिजनौर के किसान कुलबीर सिंह ने बताया कि उनके परिवार में लगभग 150 बीघा भूमि में गन्ने की खेती होती है। 0238 प्रजाति आने से पहले गन्ने का बेसिक कोटा पांच हजार क्विंटल था, 0238 के आने के बाद ये 12 हजार क्विंटल पहुंच गया था। अब मैंने खेत में दस से अधिक स्वीकृत प्रजातियां बो रखी हैं, लेकिन बेसिक कोटा साढ़े नौ हजार क्विंटल ही रह गया है।
बाकी प्रजातियों की पैदावार 20 प्रतिशत तक कम है, जबकि पेस्टीसाइड आदि पर खर्च अधिक है। बरकातपुर चीनी मिल गन्ना महाप्रबंधक विकास पुंडीर कहते हैं कि एक समय खेतों में केवल 0238 प्रजाति का ही गन्ना दिखता था। ट्रेंच विधि से बोने पर तो बंपर पैदावार होती थी। सामान्य विधि से बुआई में भी पैदावार कम नहीं थी। अब किसानों को गन्ने की दूसरी प्रजाति बोने के लिए बीज दिया जा रहा है, लेकिन अभी 0238 जैसी पैदावार किसी अन्य प्रजाति की नहीं है।
12.38 लाख हेक्टेयर में बदली गन्ने की प्रजाति
2013-14 में प्रदेश के 20 जिलों में इसका क्षेत्रफल 72,623 हेक्टेयर (3.1 प्रतिशत) था, जो 2014-15 में ही बढ़कर 1.76 लाख हेक्टेयर (8.3 प्रतिशत) हो गया था। इसके बाद विस्तार इतना हुआ कि गन्ना क्षेत्र का बड़ा हिस्सा इसी पर निर्भर हो गया। रेड राट का प्रभाव सामने आने के बाद विभाग ने इसका प्रतिस्थापन शुरू किया।
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पेराई सत्र 2023-24 में सीओ-238 की खेती 17.76 लाख हेक्टेयर में हुई थी, जो पेराई सत्र 2025-26 में घटकर 8.34 लाख रह गया था। अनुमान के अनुसार पिछले चार वर्षों में 12.38 लाख हेक्टेयर में इस प्रजाति को दूसरी किस्मों से बदला गया है। इसके बावजूद अभी कई क्षेत्रों में सीओ-0238 में रेड राट की मौजूदगी चुनौती बनी हुई है।
