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84 कोस परिक्रमा: क्या है इसका महत्व, कब मिलता है सबसे अधिक पुण्य और कहां से शुरू होती है यात्रा?

By Shiv Govind MishraaEdited By: Shiv Govind Mishraa
Updated: Sat, 15 Aug 2026 06:09 PM (IST)

ब्रज 84 कोस यात्रा द्वापर युग की कृष्ण लीलाओं से जुड़े पवित्र स्थलों की अध्यात्मिक परिक्रमा है, जिसे वेदों और वराह पुराण में अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

HighLights

  1. ब्रज 84 कोस यात्रा का गहरा पौराणिक महत्व।

  2. चातुर्मास और अधिकमास में यात्रा का शुभ समय।

  3. 84 लाख योनियों से मुक्ति का मार्ग।

शिव गोविंद मिश्रा, लखनऊ। ब्रज की पावन माटी में कदम रखते ही एक अलग ही सुकून महसूस होता है। यही वो धरती है जहां कान्हा की बाल लीलाओं की गूंज आज भी फिजाओं में तैरती है। वृंदावन, मथुरा, गोकुल, नंदगांव, बरसाना और गोवर्धन; ये सिर्फ नाम नहीं, बल्कि कृष्ण प्रेम के वो केंद्र हैं जो मिलकर 'ब्रज 84 कोस यात्रा' का आधार बनते हैं। हमारे वेदों और पुराणों में इस यात्रा को अध्यात्म का शिखर माना गया है।

आखिर क्यों खास है यह यात्रा?

वराह पुराण के मुताबिक, पृथ्वी के करीब 66 अरब तीर्थ चातुर्मास के दौरान ब्रज में आकर समा जाते हैं। यही वजह है कि भक्त इस दौरान 84 कोस की परिक्रमा करना सबसे पुण्यदायी मानते हैं।

इसके पीछे एक बेहद भावुक कथा भी जुड़ी है। कहते हैं कि जब मैया यशोदा और नंद बाबा ने चार धाम यात्रा की इच्छा जताई, तो बांकेबिहारी ने अपनी लीला से समस्त तीर्थों को ब्रज धाम में ही आमंत्रित कर दिया। जनश्रुति है कि जो भी साधक निष्काम भाव से यह परिक्रमा पूरी करता है, उसे 84 लाख योनियों के फेर से मुक्ति मिल जाती है और मोक्ष का द्वार खुल जाता है।

कब और कैसे होती है परिक्रमा?

  • शुभ समय: मुख्य रूप से अधिकमास, चातुर्मास, चैत्र और वैशाख के महीनों में यह यात्रा सबसे फलदायी मानी जाती है।
  • प्रमुख तिथियां: कई श्रद्धालु चैत्र पूर्णिमा से वैशाख पूर्णिमा तक एक महीने की यात्रा करते हैं, तो कुछ विजयादशमी के बाद इसकी शुरुआत करते हैं।
  • यात्रा का माध्यम: भक्त पैदल या वाहन दोनों तरीकों से यात्रा तय करते हैं। हालांकि, पैदल चलने का अपना एक अलग ही आनंद और तप है, जिसमें लगभग एक महीने का समय लग जाता है।

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एक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव

यात्रा का नियम है कि जिस स्थान से आप पहला कदम बढ़ाते हैं, अंतिम पड़ाव भी वही होना चाहिए। इस पूरी यात्रा के दौरान भगवान कृष्ण की स्मृतियों से जुड़े लगभग 1100 पवित्र सरोवर, 36 घनघोर वन-उपवन और कई ऐतिहासिक पहाड़ पड़ते हैं, जो हर श्रद्धालु को द्वापर युग के करीब ले जाते हैं।

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