विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

नेपाल की पीड़ा पर पिघला भारत का बचपन, कुशीनगर के अल्फाज ने डीएम को सौंपी जमा-पूंजी

Published: Thu, 03 Sep 2026 09:12 PM (IST)

कुशीनगर के 6 वर्षीय अल्फाज शेख ने नेपाल बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए अपनी गुल्लक की पूरी जमा-पूंजी जिलाधिकारी ...और पढ़ें

HighLights

  1. छह वर्षीय अल्फाज ने नेपाल बाढ़ पीड़ितों को गुल्लक दी।

  2. कुशीनगर के जिलाधिकारी को सौंपी अपनी पूरी जमा-पूंजी।

  3. बच्चे की संवेदना ने भारत-नेपाल रिश्तों को मजबूत किया।

अजय कुमार शुक्ल, कुशीनगर। नेपाल में आई भीषण आपदा ने सीमाएं जरूर लांघीं, लेकिन उससे उपजी पीड़ा ने भारत के दिल को भी छू लिया। अपनों को खोने और घर-गृहस्थी उजड़ने की खबरों के बीच मदद के लिए बड़े-बड़े हाथ आगे बढ़ रहे हैं, वहीं भारत की नई पीढ़ी यहां तक कि जेन अल्फा भी पड़ोसी देश के दर्द को अपना समझ रहा है।

कुशीनगर में इसका मार्मिक उदाहरण गुरुवार को देखने को मिला, जब विशुनुपरा के रहने वाले महज छह वर्ष के अल्फाज शेख अपना गुल्लक लेकर जिलाधिकारी कार्यालय पहुंच गए।

नन्हे अल्फाज ने जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर के सामने अपना गुल्लक रखते हुए कहा कि इसे नेपाल में बाढ़ से पीड़ित लोगों की मदद के लिए भेज दीजिए। यह रकम उसके लिए महज सिक्कों और नोटों का संग्रह नहीं थी, बल्कि बचपन की छोटी-छोटी इच्छाओं को पूरा करने के लिए जोड़ी गई उसकी पूरी जमा-पूंजी थी। फिर भी आपदा में फंसे लोगों की तस्वीरों ने उसके मन में ऐसी संवेदना जगाई कि अपनी जरूरत से पहले उसने दूसरों की जरूरत को रख दिया।

गुल्लक सौंपते समय अल्फाज के चेहरे पर मासूमियत थी, लेकिन उसके फैसले में असाधारण परिपक्वता नजर आई। जिलाधिकारी भी बच्चे की इस सोच से भावुक हो गए। कलेक्ट्रेट में मौजूद लोगों के लिए यह दृश्य कुछ क्षण के लिए प्रशासनिक गतिविधियों से अलग एक ऐसा मानवीय पल बन गया, जिसने भारत-नेपाल के रिश्तों की गहराई को नए ढंग से सामने रखा।

नेपाल और भारत के बीच सिर्फ खुली सीमा और आवाजाही का रिश्ता नहीं है। दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंध हैं।

सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए पड़ोसी देश में आई विपदा अक्सर अपने ही घर में आई मुसीबत जैसी महसूस होती है। ऐसे में कुशीनगर के इस बच्चे की पहल उस साझा संवेदना की छोटी मगर बेहद प्रभावशाली तस्वीर बनकर सामने आई है।

अल्फाज की गुल्लक में शायद इतनी बड़ी रकम न हो कि नेपाल की तबाही का दर्द कम कर सके। लेकिन उसकी कीमत रकम से कहीं ज्यादा है। यह संदेश है कि मानवीय मदद की कोई उम्र नहीं होती और संवेदना के लिए किसी बड़े होने का इंतजार नहीं करना पड़ता।

नेपाल की त्रासदी के बीच जब भारत से राहत और मदद के हाथ बढ़ रहे हैं, तब छह साल के इस बच्चे की गुल्लक यह भी बता रही है कि पड़ोसी की पीड़ा देखकर भारत का बचपन भी चुप नहीं बैठा। उसकी छोटी-सी बचत ने सीमा के आर-पार रिश्तों की एक बड़ी तस्वीर खींच दी, जहां इंसानियत सबसे पहले है।

यह भी पढ़ें- नारायणी से निकल रहे गृहस्थी के निशान, हर लकड़ी सुना रही है उजड़े घर की कहानी