कानपुर में 200 करोड़ से अधिक का नजूल जमीन घोटाला, सरकारी संपत्तियों की अवैध बिक्री का खुलासा
कानपुर में नजूल भूमि की अवैध बिक्री के तीन बड़े मामले सामने आए हैं, जिनमें 206 करोड़ रुपये से अधिक की सरकारी जमीन बेची गई है। पुलिस ने जांच शुरू कर दी है और इसमें संगठित गिरोह या अधिकारियों की मिलीभगत की भी पड़ताल की जा रही है।

HighLights
बीते एक साल में नजूल भूमि बिक्री के तीन मामले दर्ज
कुल 206 करोड़ रुपये से अधिक की सरकारी जमीन बेची गई
पुलिस जांच में संगठित गिरोह, अधिकारियों की मिलीभगत की पड़ताल
जागरण संवाददाता, कानपुर। नजूल भूमि पर बने सीबीसीआइडी दफ्तर को बेचे जाने के मामले में पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। इस मामले में जुड़े अन्य आरोपितों का पता लगाने के लिए प्रशासन से दस्तावेज मांगे गए हैं। हालांकि नजूल जमीन बेचने का यह पहला प्रकरण नहीं हैं। बीते एक साल में तीन मामलों में जांच करके मुकदमा दर्ज कराने की कार्रवाई की गई है। जिसमें लगभग 206 करोड़ रुपये से अधिक की नजूल संपत्तियों को बेचकर सरकारी धन को सफेदपोश डकार गए हैं।
पहला मामला सिविल लाइन्स स्थित नजूल भूमि के ब्लाक-14 के प्लाट संख्या-3 का है। यहां आरोपित तरंग बेरी, नीरज बेरी, विकास बेरी, मनका शर्मा ने मिलकर एसए बिल्ड प्राइवेट लिमिटेड और अहमद ऐतिशाम के नाम बैनामा कर दिया गया। इस मामले में लेखपाल की ओर से 17 अप्रैल 2026 में कोतवाली में एफआईआर दर्ज कराई गई है। आरोपितों में तीन सगे भाई और बहन हैं, जो इस समय में अमेरिका के अलग-अलग शहरों में रहते हैं।
मौजूदा समय में इसी जमीन पर सीबीसीआईडी कार्यालय संचालित हो रहा है। यह जमीन करीब 3846.8 वर्गमीटर क्षेत्रफल वाली इस जमीन की वर्तमान सर्किल रेट के अनुसार कीमत लगभग 24.77 करोड़ रुपये आंकी गई है। हालांकि इसी जमीन से जुड़े भूभाग में अपार्टमेंट बनाकर बेच दिए गए हैं। अभी उन पर कार्रवाई को लेकर प्रशासनिक अधिकारी खामोश हैं।
दूसरा मामला भी सिविल लाइन्स के ब्लाक-14 स्थित प्लाट संख्या-6 का है, जिसमें अमित पांडेय के खिलाफ फरवरी 2026 में पीपी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराया गया। इस जमीन का क्षेत्रफल 9740.90 वर्गमीटर है और इसकी अनुमानित कीमत करीब 14.89 करोड़ रुपये है। प्रशासन का आरोप है कि इस भूमि पर भी अनियमित कब्जा और उपयोग किया गया।
तीसरा और सबसे बड़ा मामला ब्लाक-15 के प्लाट संख्या-69, 69ए, 69बी और 69सी से जुड़ा है। इस प्रकरण में जितेन्द्र सिंह, नरेन्द्र सिंह और नागेन्द्र सिंह के खिलाफ दिसंबर 2025 में एफआईआर दर्ज की गई थी। करीब 26,237.644 वर्गमीटर में फैली इस जमीन की कीमत सर्किल रेट के अनुसार लगभग 166.60 करोड़ रुपये है। आरोप है कि इस सरकारी संपत्ति का भी नियमों को दरकिनार कर खरीद-बिक्री की गई है।
तीनों मामलों को जोड़ें तो कुल जमीन की कीमत करीब 206.26 करोड़ रुपये है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि नजूल भूमि सरकारी संपत्ति होती है, जिसका हस्तांतरण बिना सक्षम अनुमति के पूरी तरह अवैध है। इन मामलों में राजस्व को भारी नुकसान पहुंचाने और नियमों की अनदेखी करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है।
जिला प्रशासन अब इन सभी मामलों की गहराई से जांच कर रहा है। साथ ही यह भी खंगाला जा रहा है कि कहीं इसमें संगठित गिरोह या अधिकारियों की मिलीभगत तो नहीं रही। अगर किसी की भूमिका मिलती है, तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
नजूल भूमियों को बेचने को लेकर एक साल में तीन मुकदमें दर्ज कराए गए हैं, जो शिकायतें मिली हैं, उनकी जांच भी कराई जा रही हैं। सरकारी भूमि को बेचने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा रही है, वहीं उन जमीनों पर पुन:प्रवेश की कार्रवाई की जा रही है।
जितेन्द्र प्रताप सिंह, जिलाधिकारी

