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...कुछ ऐसी थी आजादी की सुबह, घरों में पूड़ी बनी, नए कपड़े पहन कर निकले लोग; 105 साल की बुजुर्ग ने सांझा की यादें

Updated: Fri, 14 Aug 2026 07:41 PM (IST)

श्याम कुंवर (106) और मलखान सिंह (90) जैसे बुजुर्गों ने देश की आजादी की पहली रात की यादें साझा कीं, जब गांवों में रेडियो पर खबर सुनकर जश्न मना था। लोगो ...और पढ़ें

श्याम कुंवर। जागरण

श्याम कुंवर। जागरण

HighLights

  1. बुजुर्गों ने साझा की 1947 की आजादी की पहली रात की यादें

  2. गांवों में रेडियो पर खबर सुनकर मना था आजादी का जश्न

  3. गुड़ बांटा गया, पूड़ी बनी, लोगों ने नए कपड़े पहने

जागरण संवाददाता, उरई। घर कै जनानी खपरैल तै झांक रही थीं, हमौ घर कै बहुरिया होवै कै खातिर बाहर नाही निकर पाई तौ आंगनई से सुनत रही। गोरा भूपका गांव की 106 साल की श्याम कुंवर देश के आजाद होने के समय अपनी ससुराल में थीं। स्वतंत्रता दिवस की वह पहली रात को याद करते हुए कहती हैं कि अब याद धुंधली होती जा रही है, लेकिन इतना ध्यान है कि उस रात गांव के मुखिया तिरंगा लेकर गांव वालों के साथ निकले थे और फिर चौपाल लगाई गई थी।

उन्हीं की तरह और भी कई वरिष्ठ नागरिक ऐसे हैं जो देश के पहले स्वतंत्रता दिवस की उस पहली रात की याद को ताजा कर उत्साहित हो उठते हैं। दीपावली, होली से भी बढ़ कर इस राष्ट्रीय पर्व पर हर भारतवासी के दिल हिलोरे मारने लगता है। 15 अगस्त का दिन हमें भारतीय होने पर गर्व कराता है। यह दिन पाने के लिए देश के हजारों देशवासी हंसते-हंसते बलिदान हो गए थे।

आज भले ही हम इसकी कीमत न समझें लेकिन आजादी की वह पहली सुबह कैसी थी उस क्षण को याद कर उस पल के गवाह कई बुजुर्गों से बात छेड़ते ही उनके आंखों में चमक जाग उठती है। उनके उस उत्साह की झलक उन्हीं की जुबानी समझते हैं।


श्याम कुंवर कहती हैं कि गांव मा एकै रेडियो हतो..जासै पता चलो कि देश कौ आजादी मिल गौ है। इस खुशी में गांव का मुखिया की चौपार पर रात को चौपाल लगाई गई। लोगों में गुड़ वितरित कर खुशियां जताते लोग पूरी रात सोए नहीं। दूसरे दिन सुबह से ही लोगों में बस आजादी की ही चर्चा छाई थी। महिलाएं व घर की बहुएं खबरैल व दरवाजा की दराज से झांक रही थीं। दूसरी दिन घरों में पूड़ी बनाई गई और लोग नए कपड़े पहन कर घूम रहे थे। देवरानी केसर और हम भी देश आजाद होने की खबर सुन कर उत्साहित थे।

माधौगढ़ तहसील के गोहन गांव के 90 वर्षीय मलखान सिंह पटीदार कहते हैं कि कि उस समय अंग्रेजों का बोल-बाला था, गुलामी की वजह से अंग्रेजों के खिलाफ हर जगह लड़ाई चल रही थी। जहां आंदोलनकारी मिलते तो अंग्रेज वहीं मारने लगते थे। युवाओं में अंग्रेजों के खिलाफ बहुत जोश था।

देश जैसे ही आजाद हुआ तो उस रात रेडियो के माध्यम से खबर लगी। फिर क्या पूरे गांव में उत्साह छा गया था। लोग घरों से बाहर निकल कर उत्साह में नारे लगाते घूम रहे थे। आज की तरह मिठाइयां तो नहीं थीं लेकिन गुड़ की बनी पट्टी आदि खूब बांटी गई। दूसरे दिन घरों में पकवान बनाए गए जैसे दीपावली हो।