जालौन की डॉ. अर्चना विश्वास- 5000 से अधिक जिंदगियों से मिटाया नशे का अंधकार
जालौन जिला अस्पताल की डॉ. अर्चना विश्वास ने छह सालों में 5000 से अधिक लोगों को नशे की लत से मुक्ति दिलाई है। वे परामर्श के साथ विद्यालयों, महाविद्यालय ...और पढ़ें

उरई में आयोजित कैंप में मरीजों को देखती डा अर्चना विश्वास। स्वयं।
HighLights
डॉ. अर्चना ने 5000 से अधिक लोगों को नशामुक्त किया।
छह साल से जालौन में चला रहीं नशामुक्ति अभियान।
काउंसिलिंग और जागरूकता से बदल रहीं लोगों की जिंदगी।
अतुल त्रिपाठी, उरई। नशा करने वाले दोस्तों की संगत ने मंजीत के परिवार की खुशियां ही नहीं छीनी, उनके स्वास्थ्य के साथ भविष्य पर भी सवाल खड़े कर दिए। उन्हें गांजा, स्मैक और दूसरे नशों की लत ने घेर लिया।
अपने बारे में वर्तमान और चार साल पहले का फर्क बताते हुए मंजीत कहते हैं कि उन्हें लग रहा था कि अब उनकी जिंदगी कुछ ही दिनों की है। इसी बीच एक चिकित्सक की सलाह ने उन्हें क्लीनिकल साइकोलाजिस्ट डॉ. अर्चना विश्वास से मिला दिया। यह मुलाकात उनके जीवन में ऐसा बदलाव लेकर आई कि आज भरापूरा परिवार है। पत्नी-बच्चे सभी खुश हैं।

अर्चना विश्वास ने केवल उनकी ही नहीं, ऐसे ही पांच हजार से ज्यादा लोगों की जिंदगी से नशे का अंधकार बीते छह साल में मिटाया और उनके परिवारों को उनकी खोई खुशियां वापस लौटा दीं।
उत्तर प्रदेश में जालौन के जिला अस्पताल में मनोचिकित्सा विभाग में कार्यरत डॉ. अर्चना का वर्ष 2020 से कोई दिन ऐसा नहीं जाता, जब उनके पास नशे के कारण अवसाद से ग्रस्त लोग न आते हों। वह कहती हैं कि नशे के इंजेक्शन लेने वाले दो युवक उनके पास पहली बार आए तो उन्हें देखकर मन में हूक उठी और तभी से नशामुक्ति का अभियान छेड़ दिया।
दरअसल, नशा कोई बीमारी नहीं है, बल्कि इच्छाशक्ति कमजोर होने का नतीजा है। अधिकांश लोग शौकिया या फिर अवसाद में आकर नशा शुरू कर देते हैं। इससे दूर होने के लिए दवा के बजाय उनको सही ढंग से समझाना ज्यादा कारगर है। नियमित काउंसिलिंग, परिवार के सहयोग और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने मंजीत को नशे की लत से छुटकारा दिलाया।
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जिला अस्पताल के मानसिक रोग विभाग में प्रतिदिन ऐसे ही 15 से 20 मरीज पहुंचते हैं, जो शराब, गांजा, स्मैक, तंबाकू व अन्य मादक पदार्थों की लत के कारण अवसाद, चिंता, पारिवारिक कलह और सामाजिक समस्याओं से जूझ रहे होते हैं।
नशे का दवा नहीं, मानसिक माहौल से उपचार
डॉ. अर्चना विश्वास बताती हैं कि किसी भी मरीज का उपचार केवल दवा से शुरू नहीं होता। सबसे पहले वह मरीज से लंबी बातचीत कर उसकी मानसिक स्थिति, नशा शुरू करने का कारण, पारिवारिक माहौल और नशे की ली जाने वाली डोज के प्रभाव के बारे में गंभीरता से समझती हैं।
इसके बाद मरीज की मोटिवेशनल काउंसिलिंग की जाती है, जिसमें उसे नशे से होने वाले नुकसान व नशा छोड़ने के बाद मिलने वाले लाभ समझाए जाते हैं। जरूरत पड़ने पर परिवार के सदस्यों को भी काउंसिलिंग में शामिल किया जाता है, ताकि घर का माहौल मरीज के लिए सहयोगी बन सके।

इसके बाद मरीज के लिए चरणबद्ध योजना में पहले नशे की मात्रा धीरे-धीरे कम कराई जाती है और आवश्यकता होने पर दवाएं दी जाती हैं। फिर इसका नियमित फालोअप, काउंसिलिंग, व्यवहार परिवर्तन, तनाव प्रबंधन, सकारात्मक गतिविधियों में भागीदारी के साथ पुराने नशे वाले साथियों से दूरी बनाने पर विशेष जोर देने की रणनीति अपनाई जाती है। मरीज के हर छोटे सुधार की सराहना कर उसका आत्मविश्वास बढ़ाया जाता है, जिससे दोबारा नशे की ओर लौटने की आशंका कम हो जाती है।
सामाजिक संगठनों के सहयोग से चला रहीं जागरूकता अभियान
डॉ. अर्चना अब केवल जिला अस्पताल तक सीमित नहीं हैं। वह विद्यालयों, महाविद्यालयों, सरकारी संस्थानों व सामाजिक संगठनों के सहयोग से नशा मुक्ति जागरूकता अभियान और शिविर भी आयोजित कर रही हैं। इन कार्यक्रमों में युवाओं व अभिभावकों को नशे के दुष्परिणामों और बचाव के उपायों की जानकारी देती हैं।
वह कहती हैं कि बचपन में उन्होंने देखा कि कई लोग अपने बच्चों को अधिक डांट देते थे, जिससे बच्चों का रुझान गलत संगत में या फिर उसके व्यवहार में दिखता था।
इसी सोच ने उन्हें इस क्षेत्र में आकर कुछ अलग करने की प्रेरणा दी। उनको वास्तविक खुशी व पारिश्रमिक तब मिलता है, जब नशा छोड़ने वाला और उसके परिवार के लोग उन्हें धन्यवाद देते हैं। इसी से आत्मबल बढ़ता है।
दोषी न ठहराएं, आत्मविश्वास जगाएं
डॉ. अर्चना कहती हैं कि 'नशा कोई लाइलाज बीमारी नहीं है। सही समय पर पहचान, नियमित काउंसिलिंग, परिवार का सहयोग व मरीज की मजबूत इच्छाशक्ति से किसी को भी नशे की लत से बाहर लाया जा सकता है।
इसके लिए आवश्यकता है कि मरीज को दोषी नहीं ठहराएं, बल्कि उसका आत्मविश्वास लौटाएं। जब व्यक्ति को यह भरोसा हो जाता है कि वह नशा छोड़ सकता है, तभी उपचार की वास्तविक शुरुआत होती है।