मां के बाद परिवार के 15 लोगों का नेत्रदान, अब खुद भी देहदान कर अमर हो गए बरेली के पूर्व चेयरमैन
बरेली के नवाबगंज नगरपालिका के पूर्व अध्यक्ष राजेंद्र शुक्ला के निधन के बाद उनकी आंखें नेत्रहीनों को दुनिया दिखाएंगी, उन्होंने ...और पढ़ें

राजेंद्र शुक्ला। फाइल फोटो
HighLights
बरेली के पूर्व पालिकाध्यक्ष राजेंद्र शुक्ला ने देहदान भी कर मानवता की मिसाल की पेश
अब यह जिम्मेदारी उनके बेटे पवन शुक्ला व पत्नी विमला शुक्ला निभाएंगी
अनिल पटेल, बरेली। नवाबगंज नगरपालिका के प्रथम अध्यक्ष राजेंद्र शुक्ला गुरुवार को सदैव के लिए विदा हो गए, मगर उनकी आंखें दुनिया देखती रहेंगी। उनकी आंखें अब किसी नेत्रहीन की दुनिया को रोशन करेंगी। वह 21 वर्षों से जागरुकता का दीपक जला रहे थे, जिसकी लौ ने कई लोगों की जिंदीग में उजियार भर दिया। वह देहदान कर चुके थे। उनके दुनिया से जाने के बाद इस सामाजिक जिम्मेदारी को बेटे पवन शुक्ला व पत्नी विमला शुक्ला निभाएंगी। वे दोनों लोग भी नेत्रदान के साथ देहदान का संकल्प ले चुके।
वर्ष 1988 में पालिकाध्यक्ष बने राजेंद्र शुक्ला विभिन्न सामाजिक एवं शैक्षिक संगठनों के पदाधिकारी भी रहे। वर्ष 2005 में मां देवकी शुक्ला का देहांत हुआ तो उनके नेत्रदान कराए। उसके बाद से राजेंद्र शुक्ला ने देवकी फाउंडेशन बनाकर लोगों को देहदान-नेत्रदान के लिए जागरूक करना शुरू कर दिया।
उनके बेटे आचार्य अरविंद शुक्ला बोले, 21 वर्ष पहले दादी का नेत्रदान कराते समय रिश्तेदार अचंभित थे कि ऐसा क्यों कर रहे। बाद में उनकी समझ में आ गया कि दुनिया से जाने के बाद भी हम किसी के काम आ सकते हैं। उनके परिवार व संपर्क के 15 लोग नेत्रदान कर चुके।
पिछले सप्ताह 79 वर्ष की अवस्था में पिता की तबीयत बिगड़ने पर श्रीराममूर्ति स्मारक मेडिकल कालेज में भर्ती कराया था। गुरुवार को उनका देहांत हुआ, उससे पहले अपनी देहदान की औपचारिकताएं पूरी कर चुके थे।
डाॅ. मधु के माता-पिता कर चुके नेत्रदान, खुद भी संकल्पित
सीबीगंज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात डाॅ. मधु गुप्ता की मां मंजू गुप्ता ने 12 वर्ष पहले मुरादाबाद में नेत्रदान किया था। 10 दिसंबर को श्रीराममूर्ति स्मारक मेडिकल कालेज में पिता आरके गुप्ता का नेत्रदान हुआ।
डाॅ. मधु गुप्ता, बहन रमा गुप्ता, बुआ संगीता गुप्ता, राधा गुप्ता भी नेत्रदान के लिए पंजीकरण करा चुकीं। वह बोलीं, इनरव्हील ग्लोरी क्लब से जुड़कर 10 अन्य महिलाओं व पांच स्वास्थ्यकर्मियों का नेत्रदान पंजीकरण करा चुकी हूं। मैं गर्व महसूस करती हूं कि मृत्यु के बाद मेरी आंखें किसी जरूरतमंद के काम आएंगी, वो दुनिया देख सकेगा।
