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    कांवड़ यात्रा में डीजे का बढ़ा शोर: 'बोल बम' के जयकारों पर भारी पड़ा आधुनिक प्रदर्शन, गुम हो रही आत्मिक भक्ति

    Updated: Sun, 09 Aug 2026 01:00 AM (IST)

    कांवड़ यात्रा का पारंपरिक स्वरूप बदल गया है, जहां 'बोल बम' के जयकारे अब डीजे के शोर में दब गए हैं। आधुनिक प्रदर्शन के कारण यात्रा की आत्मिक भक्ति और प ...और पढ़ें

    कछला गंगा घाट से बदायूं की ओर जाता ट्राॅली में बंधा भारी भरकम डीजे। जागरण

    कछला गंगा घाट से बदायूं की ओर जाता ट्राॅली में बंधा भारी भरकम डीजे। जागरण

    HighLights

    1. बदलते वक्त के साथ बदला कांवड़ यात्रा का पारंपरिक स्वरूप

    जागरण संवाददाता, बदायूं। गंगा घाटों से जल भरकर चलने वाले शिवभक्तों की आस्था अब तकनीक के शोर में सिसक रही है। कभी जिन सड़कों पर केवल बोल बम-तारक बम के भक्तिमय जयकारे गूंजते थे, आज वहां हजारों वाट के डीजे सिस्टम की धमक सुनाई देती है। आस्था का यह नया स्वरूप अब भक्ति पर आधुनिक प्रदर्शन की परत चढ़ा रहा है। दुखद यह है कि बेस और साउंड के इस मुकाबले में आस्थावान श्रद्धालुओं के पवित्र जयकारे डीजे के कानफोड़ू शोर के आगे पूरी तरह दबकर रह जा रहे हैं।

    एक दौर वह भी था जब कांवड़ यात्री नंगे पांव, पैदल चलते हुए केवल अपने भोलेनाथ के ध्यान में लीन रहते थे। राह में छालों का दर्द होता था, तो मुंह से निकलने वाला बोल बम का नारा उस दर्द के लिए संजीवनी बन जाता था। दूर से ही जब कांवड़ियों का जत्था गुजरता था, तो पूरा माहौल अलौकिक और भक्ति से भर उठता था।

    लेकिन, वक्त के साथ कांवड़ यात्रा का पारंपरिक स्वरूप बदल चुका है। अब भक्ति की पहचान जयकारों से नहीं, बल्कि इस बात से तय हो रही है कि किसका डीजे कितना बड़ा और धमक कितनी तेज है। सड़कों पर निकलती विशालकाय डीजे कांवड़ के आगे भक्ति के बोल बौने साबित हो रहे हैं। भक्ति अब श्रद्धा से ज्यादा शक्ति और साधन प्रदर्शन का जरिया बनती दिख रही है।

    बुजुर्ग बताते हैं कि पहले मन में शांति और शिव का नाम रहता था, लेकिन अब शोर-शराबे में आत्मिक जुड़ाव ही खो गया है। युवा कांवड़ियों में आधुनिक साउंड सिस्टम का क्रेज इस कदर बढ़ चुका है कि वे बोल बम कहने के बजाय बेस की धमक पर थिरकना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। आस्था की इस अंधी दौड़ ने कांवड़ यात्रा के मूल, उसकी पवित्रता और उसके मर्म को गहरे संकट में डाल दिया है।

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    आधुनिकता की चकाचौंध में गुम जयकारे

    कभी कांवड़ यात्रा सादगी, संयम और अटूट विश्वास का प्रतीक थी। श्रद्धालु केवल भोलेनाथ के नाम के सहारे बिना किसी दिखावे या शोर के सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करते थे। राहगीर भी उनके जयकारे सुनकर श्रद्धा से नतमस्तक हो जाते थे। लेकिन, आज की आधुनिकता और दिखावे ने यात्रा की उस पौराणिक सादगी और आध्यात्मिक भाव को पीछे छोड़ दिया है।

    पवित्रता को धूमिल करते साउंड

    कांवड़ यात्रा में डीजे का अत्यधिक तेज शोर अब अध्यात्म को नुकसान पहुंचाने के साथ स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन गया है। इससे बहरेपन की समस्या बढ़ रही है और हृदय रोगियों के लिए यह धमक बेहद जानलेवा है। प्रशासनिक नियमों को दरकिनार कर बजने वाले ये भारी-भरकम साउंड सिस्टम यात्रा की पवित्रता और शांति को लगातार धूमिल कर रहे हैं।

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