कोडीन सिरप के बाद नशे का नया नाम ‘ नीला कैप्सूल’, सस्ते के चक्कर में आदी बन रहे तेजी से युवा
कोडीन सिरप के बाद अब 'नीले कैप्सूल' अलीगढ़ के युवाओं में नशे का नया जरिया बन गए हैं, जिससे औषधि विभाग सतर्क हो गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, ये दवाएं ...और पढ़ें

बाजार में बिकने वालेे नीले कैप्सूल को युवा नशे के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं।
जागरण संवाददाता, अलीगढ़। कोडीन युक्त कफ सिरप के दुरुपयोग के बाद अब ‘नीले कैप्सूल' युवाओं के लिए नया नशा बनकर उभर रहे हैं। लखनऊ में लाखों रुपये कीमत के ‘स्पास्मो प्राक्सीवान’ समेत अन्य प्रतिबंधित कैप्सूलों की बरामदगी के बाद जनपद में भी औषधि विभाग सतर्क हो गया है। अधिकारियों का कहना है कि नियंत्रित दवाओं की बिना चिकित्सकीय पर्चे बिक्री पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी।
शिकायतें मिलने पर विक्रेताओं के यहां तत्काल छापेमारी कर नियमानुसार सख्त कार्रवाई होगी। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रेगाबालिन, गैबापेंटिन और स्पास्मो प्राक्सीवान जैसी दवाएं चिकित्सकीय उपयोग के लिए बनाई गई हैं, लेकिन कुछ युवा इन्हें नशे के उद्देश्य से लेने लगे हैं। शुरुआत में इनसे हल्की राहत या नशे जैसा एहसास होता है।
लेकिन लगातार सेवन से शरीर और मस्तिष्क इनका आदी हो जाता है। बाद में दवा न मिलने पर बेचैनी, अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, घबराहट और अवसाद जैसी समस्याएं सामने आने लगती हैं। गंभीर मामलों में ओवरडोज से सांस लेने में तकलीफ, बेहोशी और जान का खतरा भी हो सकता है। इन दवाओं को शेड्यूल-एच1 श्रेणी में रखा गया है।
इनकी बिक्री केवल पंजीकृत चिकित्सक के वैध पर्चे पर ही की जा सकती है और मेडिकल स्टोर संचालकों को प्रत्येक बिक्री का रिकार्ड रखना अनिवार्य है। बावजूद, कोडीन सिरप हो या नशे में प्रयुक्त अन्य दवाएं जनपद में बिना पर्चे के बेचे जाने की शिकायतें मिलती रहीं हैं।
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व्यवहार में बदलाव व पढ़ाई में अरुचि पर अलर्ट हो जाएं माता-पिता
श्री कुंज बिहारी फिजियोथेरेपी एंड साइकोथेरेपी सेंटर की सीनियर साइकोलाजिस्ट डा. शिल्पी जैन अग्रवाल का कहना है कि आजकल मानसिक तनाव, पढ़ाई का दबाव और करियर को लेकर अनिश्चितता है, जिससे राहत पाने के लिए कई युवा नशे का सहारा लेते हैं। इसके अलावा, दोस्तों का बढ़ता दबाव (पियर प्रेशर) और ‘कूल' दिखने की होड़ में भी कई किशोर पहली बार नशा चखते हैं।
एक तरफ सोशल मीडिया का दौर तो दूसरी तरफ परिवार में संवाद की कमी, युवाओं को इस अंधेरे की ओर धकेलता है। शुरुआत शौक के तौर पर होती है, लेकिन धीरे-धीरे यह निर्भरता में बदल जाती है।
यदि किसी युवा के व्यवहार में अचानक बदलाव, पढ़ाई या काम में रुचि कम होना, बार-बार पैसे मांगना, अत्यधिक नींद या परिवार से दूरी जैसे संकेत दिखें तो इसे सामान्य न समझें। समय पर काउंसिलिंग और उपचार से इस लत से बाहर निकला जा सकता है।