क्या आपका स्मार्टफोन आपकी बातें सुन रहा है? जानें विज्ञापनों का रहस्य और डेटा प्राइवेसी के आसान तरीके
जब आप गहरी नींद में होते हैं तो भी स्मार्टफोन डेटा को सेंड और रिसीव करने, सिक्टोरिटी पैचेज जांचने और सिस्टम सेटिंग को सिंक करने जैसे कार्यों में जुटा ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
ब्रह्मानंद मिश्र, नई दिल्ली। अक्सर आपने गौर किया होगा कि किसी सामान या गैजेट के बारे में आप किसी से चर्चा करते हैं तो कुछ ही देर बाद उससे संबंधित ढेर सारे विज्ञापन आपको दिखने लगते हैं। इससे यह शक होता है कि फोन कहीं हमारी बातों को सुन तो नहीं रहा है। हालांकि, पक्के तौर पर इस बात के सबूत नहीं है और न इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म इसे स्वीकार करते हैं। फिर भी यह सवाल तो है कि विज्ञापन इतने सटीक क्यों दिखते हैं?
दरअसल, आपको विज्ञापन दिखाने के लिए फोन के माइक्रोफोन की जरूरत नहीं है, बल्कि उससे कहीं अधिक आपकी निजी जानकारियां प्लेटफार्म के पास पहले से ही मौजूद होती हैं। यहां तक कि एड दिखाने वालों को यह भी पता होता है कि आपकी जरूरतें क्या हैं और आपको किन चीजों की तलाश हो सकती है। हालांकि, कई सारे एप्स को दी गई अनावश्यक परमिशन और कुछ फेक एप्स द्वारा डेटा में सेंध ऐसे जोखिम को बढ़ा भी सकते हैं।
बीते दो दशकों के स्मार्टफोन के इस दौर में हमारी रोजमर्रा की जिंदगी हर छोटे-बड़े कार्य के लिए इस पर निर्भर हो चुकी है। अब तो प्रांप्ट और अलर्ट्स के जरिये फोन के साथ हमारा रिश्ता चौबीसो घंटे बना रहता है। इंटरनेट मीडिया पोस्टिंग से लेकर अमेजन पर खरीदारी, गूगल सर्च से लेकर चैटजीपीटी की क्वेरी तक, तकनीक हमें बहुत करीब से जान चुकी है। ऐसे में विज्ञापन दिखना कोई असहज करने वाली बात नहीं है।
फिर भी, जब लगता है कि फोन हमें सुन रहा है, तो असहजता महसूस होती है कि तकनीक ने अब सीमाएं लांघ दी हैं। एडवर्टाइजर कैसे हमारी दिलचस्पी का सटीक अंदाजा लगाते हैं, इसमें कोई जादू नहीं, बल्कि सांख्यिकी का कमाल है। वे हमारे हर बर्ताव पर नजर रखते हैं, इसके लिए उन्हें माइक्रोफोन पर कान लगाने की जरूरत नहीं है।
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कैसे दिखने लगते हैं संदिग्ध एड

एड टारगेटिंग अलग-अलग सोर्स से जुटाए गए व्यापक डेटा सेट पर निर्भर होती है। इसमें आपके लोकेशन हिस्ट्री से लेकर ब्राउजिंग आदतों, एप्स के प्रयोग, खरीदारी आदतें, कांटैक्ट लिस्ट और इंटरनेट मीडिया पर बर्ताव आदि सब कुछ शामिल होता है। इन सभी डेटा को बिहैवियर प्रोफाइल के अंतर्गत एकत्र किया जाता है, जिससे आपके इंटरेस्ट का सटीक अनुमान लगता है। कई बार यह आपकी हालिया बातचीत से मेल खा जाता है। ज्यादातर मामलों में एडवर्टाइजर यह चिह्नित कर लेते हैं कि आप ऐसे व्यक्ति के आसपास हैं जिसने किसी खास प्रोडक्ट को सर्च किया है। इससे क्रॉस डिवाइस एड ट्रिगर हो जाते हैं।
उदाहरण के तौर पर, आप दोस्त के घर गए, किसी पुस्तक के बारे में चर्चा की और आपको इसका एड दिखने लगा। इसका कारण यह भी हो सकता है कि आपके दोस्त ने उस पुस्तक को सर्च किया हो या ऑनलाइन कहीं इसका जिक्र किया हो। अगर आपने किसी एप को थर्ड पार्टी के साथ डेटा शेयरिंग की अनुमति दी है, तो हो सकता है कि उनमें एड नेटवर्क भी शामिल हों।
कैसे काम करती है यह प्रक्रिया
आसान शब्दों में समझें तो इस पूरी प्रक्रिया में चार बड़े प्लेयर होते हैं- प्लेटफार्म, एडवर्टाइजर, आइडेंटिटी प्रोवाइडर और डेटा ब्रोकर। इसमें प्लेटफार्म (इंस्टाग्राम, यूट्यूब, फेसबुक आदि) एप के अंदर आपकी एक्टिविटी जैसे आप किसे फॉलो करते हैं, क्या देखते हैं, क्या सेव, सर्च या टैप करते हैं, इस पर नजर रखते हैं। इन्हें आपकी लोकेशन, डिवाइस के मॉडल, लैंग्वेज, दिन में आपकी सक्रियता के समय की भी जानकारी होती है। इसी आधार पर आपकी रुचि का अनुमान लगाकर एड दिखाते हैं।
दूसरा, एडवर्टाइजर इमेज, वीडियो, टेक्स्ट के जरिये प्रोडक्ट को प्रमोट करते हैं। ये प्लेटफार्म के साथ मिलकर सटीक यूजर तक पहुंचने का प्रयास करते हैं। तीसरा, आइडेंटिटी प्रोवाइडर्स ऐसी कंपनियां होती हैं, जो आपके ईमेल, फोन नंबर, कनेक्टेड टीवी, लैपटॉप, होम वाई-फाई के माध्यम से एडवर्टाइजर की मदद करती हैं। अंत में डेटा ब्रोकर्स इस तरह डेटा को खरीदते और पैकेज करते हैं। ये एप्स, वेबसाइट, स्टोर आदि के जरिये डेटा को जुटाते हैं। डेटा ब्रोकर्स एक बड़ी इंडस्ट्री का रूप ले चुके हैं।
एआई का प्रिडिक्टिव पावर
अनुमान के आधार पर रिजल्ट देने की एआई की खासियत के चलते आपको विज्ञापन ऐसे लगने लगते हैं मानो कि आपके विचारों के साथ उनका तालमेल बन गया है। आज के समय में एआई एल्गोरिदम ऑनलाइन विज्ञापन के तरीकों को बदल रहा है। इससे वे अंदाजा लगा सकते हैं कि आगे आप क्या खरीदेंगे और आगे क्या आपकी जरूरतें होने वाली हैं। वे लाखों करोड़ों यूजर्स के बीच से ऐसे पैटर्न को ढूंढ़ निकालते हैं जिनके शौक और आदतें आपसे मिलती जुलती हैं। मान लें, कोई यूजर आपकी तरह खरीदारी करता है, तो संभव है कि उसके द्वारा हाल में खरीदे गए प्रोडक्ट आपको भी दिखने लगें, भले ही आपने उसे कभी सर्च न किया हो। इससे भी लगता है कि मानों हर पल वे आपके विचारों को सुन रहे हैं।

इन तरीकों से कर सकते हैं प्राइवेसी बेहतर
केवल वेरिफाइड एप्स का प्रयोग : अनाधिकारिक सोर्स वाले एप्स फोन के रेगुलर सिक्योरिटी प्रोटोकाल को बाइपास कर सकते हैं, इनमें छिपे हुए मालवेयर फोन के कैमरे या माइक्रोफोन का एक्सेस ले सकते हैं। इसलिए, थर्ड पार्टी एप स्टोर या साइडलोडिंग से बचना चाहिए। एप्स के रिव्यूज के बारे में अवश्य जानना चाहिए।
अनावश्यक परमिशन न दें : कई सारे एप्स जरूरत नहीं होने पर भी माइक्रोफोन, कैमरा, लोकेशन आदि की परमिशन मांगते हैं। किसी भी एप को परमिशन देने से पहले उसकी जरूरतें जाननी चाहिए। एंड्रायड और आईओएस दोनों में ही प्राइवेसी सेटिंग में जाकर परमिशन मैनेज करने का विकल्प होता है।
सॉफ्टवेयर और एप्स रखें अपडेट : आउटडेटेड साफ्टवेयर में सेंध की आशंका अधिक होती है। एप के अपडेट होने से सुरक्षा सुनिश्चित होती है और कैमरा या माइक्रोफोन के अनधिकृत एक्सेस की आशंका कम रहती है। ऑटोमैटिक अपडेट को इनेबल करना चाहिए, जिससे नए पैचेज की सुरक्षा मिलती रहेगी।
वॉइस असिस्टेंट रिकॉर्ड को डिलीट करें : ट्रेनिंग या रिव्यू के लिए वॉइस असिस्टेंट पर पुरानी रिकॉर्डिंग का प्रयोग किया जा सकता है। इसे अकाउंट सेटिंग में जाकर मैनुअली डिलीट किया जा सकता है। इससे निजी डेटा के कंपनी के क्लाउड बने रहने की आशंका नहीं रहेगी। हालांकि, मेटा जैसी कुछ कंपनियां डेटा की कॉपी सुरक्षित रखती हैं।
जरूरत नहीं होने पर माइक्रोफोन बंद कर दें : अगर वॉइस फीचर का प्रयोग नहीं कर रहे हैं तो सिस्टम सेटिंग या एप स्पेसिफिक कंट्रोल से माइक्रोफोन एक्सेस को डिसेबल कर देना चाहिए।
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