उत्तर और दक्षिण भारत में अलग-अलग दिन क्यों मनाई जाती है नागपंचमी? जानिए इसके पीछे का रहस्य
भारतीय संस्कृति में नागपंचमी का पर्व हमें प्रकृति के उपादान नागों से जोड़ती है। मान्यता है उनकी पूजा से भय दूर होता है... ...और पढ़ें
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नागपंचमी का धार्मिक महत्व

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
प्रो. मुरली मनोहर पाठक (कुलपति, श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय)। भारत पर्वों का देश है। यहां वर्ष भर कोई न कोई पर्व अवश्य ही आयोजित होता है। हमारे यहां चैत्रशुक्ल प्रतिपदा से लेकर चैत्र कृष्ण अमावस्या तक पर्व होते हैं। इनमें प्रमुख रूप में पहला पर्व पूरे देश में नागपंचमी का और अंतिम पर्व होली के रूप में मनाया जाता है।
इसीलिए जनसाधारण में यह धारणा है कि नागपंचमी से पर्व प्रारंभ होते हैं और होली तक समाप्त होते हैं। भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जहां केवल देवताओं की पूजा ही नहीं होती, सृष्टि के जितने प्राकृतिक उपादान हैं उन सभी की किसी न किसी रूप में पूजा होती है।
आमतौर पर पूरे विश्व में कोई सर्प की पूजा की बात नहीं करता है, लेकिन भारत में वर्ष में एक दिन सांपों के लिए भी दिया गया है। विचार करने पर ज्ञात होता है कि धर्मशास्त्र के अनेक ग्रंथों चतुवर्ग, चिंतामणि, निर्णयसिंधु, धर्मसिंधु, तिथितत्व चिंतामणि आदि में नागपंचमी उल्लेख है। आमतौर से सब लोग श्रावण शुक्ल पंचमी को नागपंचमी के रूप में मनाते हैं, किंतु इन धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में अनेक जगह ऐसा भी उल्लेख है कि श्रावणमास की कृष्णपक्ष की पंचमी को नागपंचमी मनाया जाए। कुछ ग्रंथों में भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को नागपंचमी मनाने का भी विधान है और इसी प्रकार कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की पंचमी को भी नागपंचमी मनाने का प्रमाण मिलता है।
कहीं-कहीं मार्गशीर्ष मास की शुक्लपक्ष की चतुर्थी को भी नागों की पूजा करने का विधान किया गया है। यदि समग्र विश्लेषण करें तो दक्षिण भारत में श्रावणमास की कृष्ण पक्ष की पंचमी को नागपंचमी के रूप में मनाते हैं और उत्तर भारत में श्रावणमास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है।
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चमत्कार चिंतामणि में कहा गया है कि श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पंचमी के रूप में मनाना चाहिए। नागपंचमी के अतिरिक्त अन्य पंचमी सदैव चतुर्थीयुक्ता स्वीकार करना चाहिए। धर्मशास्त्र के ग्रंथों में इसको मनाने का विधान करते हुए कहा गया है कि श्रावण मास की पंचमी तिथि को चाहे वह कृष्णपक्ष की या शुक्लपक्ष की हो, घर के दरवाजे के दोनों तरफ गोबर से सांप की आकृति बनाई जाती है और उसके बाद उस पर दूब तथा दही से तथा अन्य सुगंधित सामग्रियों से पूजन करने का विधान है। नागपंचमी को नागपूजा करने से नाग देवता संतुष्ट होते हैं और धन-धान्य प्रदान करते हैं।
इसी प्रकार इसके कर्तव्यों को बताते हुए कहा गया है कि श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को व्रत करके शंखपाल तथा शेषनाग इत्यादि का चित्र बनाना चाहिए और दही व दूर्वा के अंकुरों तथा सुगंधित पुष्पों एवं दूध से पूजा करनी चाहिए। कूर्म पुराण में कहा गया है कि श्रावणमास की पंचमी तिथि को जो लोग नागों की भक्तिपूर्वक पूजा करते हैं, उनको जीवन में कभी किसी भी प्रकार का भय नहीं होता है। कालमाधव ग्रंथ में कहा गया है कि नागपंचमी के अनुष्ठान से नागों में प्रीति बढ़ती है, इसलिए उस दिन नागों की पूजा करनी चाहिए।