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    'भज गोविंदम' का संदेश: वैराग्य संसार से पलायन नहीं, बल्कि इच्छाओं को त्याग वर्तमान में आनंदित रहना है

    Updated: Mon, 06 Jul 2026 01:14 PM (IST)

    दुखी होकर संसार से पलायन करना वैराग्य नहीं है, बल्कि संसार में दुखों के बीच रहकर प्रसन्नचित रहना सच्चा वैराग्य है। ...और पढ़ें

    वैराग्य संसार से पलायन नहीं इच्छाओं का त्याग कर वर्तमान में आनंदित रहना है

    वैराग्य संसार से पलायन नहीं इच्छाओं का त्याग कर वर्तमान में आनंदित रहना है

    श्री श्री रवि शंकर (आर्ट आफ लिविंग के प्रणेता, आध्यात्मिक गुरु)। सामान्यतः ‘वैराग्य’ शब्द को सुनकर मन में एक ऐसे व्यक्ति की छवि उभरती है, जो संसार के समस्त दायित्वों का त्याग कर किसी निर्जन व एकांत स्थान के लिए पलायन कर चुका है। लोग संसार से पलायन को वैराग्य का नाम देते हैं, किंतु यह वैराग्य नहीं है। दुख, संताप और उदासीनता से बचने के लिए संसार का त्याग वैराग्य नहीं है। जो लोग स्वयं को वैरागी समझते हैं, वे उदास और दुखी रहते हैं। यह तथाकथित वैराग्य बहुत ही नीरस प्रतीत होता है। जबकि वैराग्य जीवन में कहीं अधिक मूल्यवान, परिष्कृत और अनमोल वस्तु है। एक प्रसन्नचित्त और मस्ती से भरी चेतना को ही वैराग्य कहते हैं।

    शंकराचार्य जी की रचना 'भज गोविंदम' में एक श्लोक है- 'कस्य सुखं न करोति विरागः?', जिसका अर्थ है, "वैराग्य कौन-सा सुख नहीं दे सकता?" यह सभी सुख प्रदान करता है, क्योंकि आप पूरी तरह से वर्तमान क्षण में होते हैं। वैराग्य आपसे आपका आनंद नहीं छीनता, बल्कि यह आपको वह आनंद देता है, जो कोई अन्य वस्तु नहीं दे सकती।

    वैराग्य का अर्थ यह नहीं है कि संसार व्यर्थ है और इसका त्याग कर दिया जाना चाहिए। वैराग्य का अर्थ है कि हमने अपने अनुभव से संसार की क्षणिकता और सारहीनता को जान लिया है और अब हम अधिक परिपक्व तथा अनुभवी होकर इसके सभी आकर्षणों से आगे निकल चुके हैं। जैसे बचपन में सभी को मिठाई, चाकलेट और आइसक्रीम खाना ही जीवन का लक्ष्य और सबसे अधिक आनंददायी मालूम होता है, लेकिन समय के साथ आई परिपक्वता और अनुभव से हम इन आकर्षणों की सारहीनता को जानकर इनसे मुक्त हो जाते हैं।

    इस संसार का हर बच्चा बड़ा होना चाहता है, वह भी अधिक शक्ति, स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता चाहता है। स्कूल जाने वाले बच्चे कालेज जाने पर प्रसन्न होने का स्वप्न देखते हैं। कालेज जाने वाले छात्र एक अच्छी नौकरी या व्यवसाय प्राप्त करने पर प्रसन्नता मिलने की आशा करते हैं। व्यवसाय या नौकरी प्राप्त करने वाले युवा विवाह व अपने कार्यक्षेत्र में प्रगति की कामना करते हैं। एक गृहस्थ व्यक्ति को लगता है कि वह सेवानिवृत्त होने पर और परिवार तथा कार्य की जिम्मेदारी से मुक्त होकर प्रसन्न व शांत हो पाएगा। इस प्रकार हम आशा और कामनाओं के ज्वर से पीड़ित होकर सारा जीवन अपनी प्रसन्नता को किसी आने वाले कल पर केंद्रित कर देते हैं। आने वाले कल में मिलने वाली प्रसन्नता की ‘आशा’ व इंद्रिय सुखों से मिलने वाली संतुष्टि का ‘भ्रम’ अंततः हमें बुरी तरह थका देता है।

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    “इस समय मेरी किसी भी इंद्रियगत विषय, अर्थात् सुंदर दृश्य को देखने, मधुर संगीत को सुनने, सुगंधित पदार्थों की गंध लेने, स्वादिष्ट भोजन का रस लेने और सुखमय प्रतीत होने वाले स्पर्श में कोई रुचि नहीं है। मेरा मन भागते-भागते थक चुका है और मैं अब केवल विश्राम करना चाहता हूं। इस क्षण मैं केवल शांति चाहता हूं और किसी भी गतिविधि में शामिल होने की मेरी कोई इच्छा नहीं है।” - थोड़े समय के लिए भी हमारे भीतर बना यह भाव या विचार हमें अपने केंद्र पर ले आता है। यही वैराग्य है।
    अभ्यास और वैराग्य दोनों एक-दूसरे के परिपूरक हैं। वैराग्य का यह भाव ध्यान को गति देता है। ध्यान बहुत मूल्यवान है, यह आपको अनंत के साथ एकता और शांति का अनुभव देता है। वैराग्य के साथ किया गया ध्यान हमारे दृष्टिकोण, तंत्रिका तंत्र और संपूर्ण जीवन को परिवर्तित कर सकता है। यह इतनी खुशी और आनंद ला सकता है, जो कि किसी अन्य माध्यम से संभव ही नहीं है।

    वैराग्य आपके भीतर की शक्ति है। वैराग्य का अर्थ संसार का त्याग नहीं, वरन आशा और कामना के ‘ज्वर’ का त्याग है। यह ज्वर हमें स्वयं के केंद्र से दूर रखता है। इस ज्वर के कारण हमें विश्वास हो जाता है कि हमारी प्रसन्नता किसी आने वाले कल में प्राप्त होगी और हम वर्तमान क्षण से दूर हो जाते हैं। वर्तमान का क्षण ही वास्तविक आनंद और शांति का क्षण है - वैराग्य इस तथ्य को स्पष्ट कर देता है जिससे इस आनंद का अंत नहीं होता।