सनातन के सच्चे सिपाही: कौन थे धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी? जानिए उनके अद्भुत जीवन की कहानी
अपने जीवन को ही धर्म का प्रत्यक्ष प्रमाण बना देने वाले करपात्री जी महाराज की दोनों हथेलियां ही उनका भिक्षा पात्र थीं। वस्तुतः उनका करपात्र केवल भिक्षा ...और पढ़ें
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करपात्री जी की जयंती (14 अगस्त) पर विशेष...
पं. जगजीतन पांडेय, महामंत्री, धर्म संघ शिक्षा मंडल, वाराणसी। भारतीय संस्कृति का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों का इतिहास नहीं है। यदि ऐसा होता, तो अनेक आक्रमणों और पराजयों के साथ यह सभ्यता भी इतिहास के अंधकार में विलीन हो गई होती। भारत आज भी जीवित है, क्योंकि यहां समय-समय पर ऐसे ऋषि, आचार्य और संन्यासी प्रकट होते रहे, जिन्होंने केवल धर्म का उपदेश नहीं दिया, अपने जीवन को ही धर्म का प्रत्यक्ष प्रमाण बना दिया।
बीसवीं शताब्दी में ऐसे ही विलक्षण युगपुरुष थे, धर्मसम्राट स्वामी श्रीकरपात्री जी महाराज (स्वामी हरिहरानंद सरस्वती)। वे केवल शास्त्रों के मर्मज्ञ व्याख्याता नहीं थे, उन विरले संन्यासियों में थे जिन्होंने वेदांत की गंभीरता, शंकराचार्य की तर्कपरंपरा, तुलसी की लोकदृष्टि और राष्ट्रधर्म की चेतना को अपने जीवन में एकाकार कर दिया।
उत्तर प्रदेश, प्रतापगढ़ जनपद के भटनी ग्राम में जन्मे हरिनारायण का मन बाल्यकाल से ही वैराग्य की ओर प्रवृत्त था। उन्नीस वर्ष की अवस्था में गृहत्याग कर उन्होंने हिमालय में तप, वेदांत और आत्मसाधना का मार्ग अपनाया। समाज में लौटे तो उनका जीवन स्वयं एक संदेश बन चुका था। वे भिक्षा के लिए किसी पात्र का उपयोग नहीं करते थे, दोनों हथेलियां ही उनका पात्र थीं। इसी अपरिग्रह ने उन्हें "करपात्री" बना दिया। वस्तुतः उनका करपात्र केवल भिक्षा का साधन नहीं था, वह त्याग, संयम और आत्मसंयत जीवन-दृष्टि का प्रतीक था। ईशावास्योपनिषद् कहता है— "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा" यह वाक्य उनके संपूर्ण व्यक्तित्व में साकार हो उठा था।
स्वामी करपात्री जी के लिए धर्म केवल पूजा-पद्धति या कर्मकांड नहीं था। वे कहा करते थे—"अपौरुषेय वेद एवं तदनुसारी शास्त्रों के अनुसार विधिविहित कार्य को ही धर्म कहा जाता है।" उनके लिए धर्म वही व्यवस्था थी जो व्यक्ति, समाज और सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करे। इसी कारण उन्होंने तप को लोकमंगल से और शास्त्र को समाज से जोड़ा। वृंदावन में उन्होंने रामचरितमानस की केवल एक चौपाई- "जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे..." पर लगातार 13 दिनों तक प्रतिदिन तीन-तीन घंटे प्रवचन दिया। यह उनकी विलक्षण स्मृति, भारतीय ज्ञान-परंपरा की उस गहराई का प्रमाण है, जहां एक ही चौपाई दर्शन, अध्यात्म और जीवन-दृष्टि का विराट संसार समेटे होती है।
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उन्होंने धर्म को सामाजिक उत्तरदायित्व से कभी पृथक नहीं माना। गोरक्षा आंदोलन हो, सनातन परंपरा की रक्षा का प्रश्न हो अथवा सांस्कृतिक अस्मिता का विषय, वे सदैव अग्रिम पंक्ति में दिखाई दिए। 7 नवंबर 1966 के विराट गोरक्षा आंदोलन में उन्होंने लाठियां भी खाईं और कारावास भी स्वीकार किया, किंतु अपने सिद्धांतों से विचलित नहीं हुए। उनका उद्घोष—"धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो" आज भी केवल एक नारा नहीं, भारतीय लोकमंगल-दृष्टि का घोष है। रामायण मीमांसा, वेदार्थ पारिजात, विचार पीयूष और मार्क्सवाद और रामराज्य जैसे ग्रंथों में उन्होंने परंपरा और तर्क, श्रद्धा और विवेक तथा अध्यात्म और समाज का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया।
कानपुर में भागवत-कथा के मध्य अस्वस्थ होने पर वे काशी पहुंचे और क्षेत्र-संन्यास की मर्यादा का पालन करते हुए वहीं रहे। 21 दिनों की समाधिस्थ अवस्था के पश्चात नेत्र खोलते ही उन्होंने औषधि नहीं, बल्कि भागवत-कथा सुनने की इच्छा व्यक्त की। रामचरितमानस के दशरथ-मरण प्रसंग को उन्होंने परम मंगलमय कहकर सुनाने का आग्रह किया। अंतिम समय में श्रीसूक्त, भगवन्नाम और ईश्वर-स्मरण में स्थित रहकर उन्होंने शिव-शिव-शिव का उच्चारण किया और ब्रह्मलीन हो गए। उनकी इच्छा के अनुसार केदारघाट पर गंगा में जल-समाधि दी गई।
आज जब मनुष्य ज्ञान से अधिक सूचना और साधना से अधिक सुविधा का उपासक बनता जा रहा है, तब स्वामी श्रीकरपात्री जी महाराज का जीवन हमें स्मरण कराता है कि सभ्यताएं केवल आर्थिक शक्ति से नहीं, अपने नैतिक और आध्यात्मिक आधार से जीवित रहती हैं। उन्होंने अपने उपदेशों से अधिक अपने आचरण द्वारा धर्म का प्रतिपादन किया। इसी कारण लोग उन्हें "धर्मसम्राट" कहते थे, यह उपाधि केवल सम्मानवश नहीं मिली, यह उनके जीवन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। भारतीय संस्कृति जब-जब अपने शाश्वत मूल्यों की ओर लौटेगी, स्वामी करपात्री जी महाराज का व्यक्तित्व उसे एक सचल धर्मशास्त्र की ही भांति मार्ग दिखाता रहेगा।