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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 09, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

सकारात्मक सोच और सकारात्मक चिंतन आपके जीवन को रूपांतरित कर देता है

By Preeti jhaEdited By:
Published: Sat, 09 Jul 2016 12:13 PM (IST)Updated: Sat, 09 Jul 2016 12:16 PM (IST)

वस्तुत: ईष्र्या, लोभ, लालच, ¨हसा, नफरत आदि नकारात्मक प्रवृत्तियों को सकारात्मक सोच से ही दूर किया जा सकता है।

सकारात्मक सोच और सकारात्मक चिंतन आपके जीवन को रूपांतरित कर देता है
सकारात्मक सोच और सकारात्मक चिंतन आपके जीवन को रूपांतरित कर देता है

वाह्य दृष्यमय जगत की रचना ईश्वर द्वारा की गई है। इस पृथ्वी पर मनुष्य सहित अनेक जीव-जंतु अपना जीवन-यापन करते हैं। अन्यान्य जीवों में मनुष्य विवेक युक्त होने के कारण सबसे श्रेष्ठ प्राणी है, उसे ईश्वर ने बुद्धि के द्वारा विचार करने की शक्ति प्रदान की है। विचारों को पवित्र कर व्यक्तित्व को परिमार्जित किया जा सकता है। भारत भूमि पर अनेकानेक ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने अपने को पवित्र कर आत्मा का साक्षात्कार प्राप्त किया है। अनेक ऐसे भी महापुरुष जन्मे हैं जिन्होंने ईश्वर की अनन्य भक्ति कर उनके दर्शन किए हैं। सूक्ष्म अवलोकन करने से ऐसा विदित होता है कि अतीत में मनुष्य के विचारों में निर्मलता व्याप्त रहती थी। पवित्रता, शुद्धता और मन की सरलता उनके लिए अत्यधिक महत्व रखती थी। परंपरा से स्थापित मर्यादाओं का पालन उनके द्वारा उत्कृष्ट भाव से किया जाता था। लोग वाह्य दृष्टि से वैभवशाली नहीं थे, पर हृदय से बहुत संपन्न हुआ करते थे, उनके अंतर जगत में भावों की उत्कृष्टता कूट-कूट कर भरी थी। सादा जीवन उच्च विचार उनका मूलमंत्र होता था। काल की गति के अनुसार विचारों का अवमूल्यन शुरू हुआ तो भाव जगत में शुष्कता आने लगी। लोग विचारों की उच्चता को छोड़कर मात्र भौतिक जगत की संपन्नता को श्रेष्ठ मानकर उसकी ओर आकर्षित होते चले गए। वाह्य चमक-दमक में भावों की शुद्धता कुम्हलाने लगी।
समय के साथ स्वयं को भौतिक रूप से संवारने की होड़ समाज में लग गई है। संस्कार क्षीण होने लगे। वाह्य जगत को ही सर्वस्व समझकर इस दौड़ में लोग शमिल होते चले गए। प्रेम, सहिष्णुता, दया परोपकार के स्थान पर वाह्य जगत की संपन्नता हावी होती चली गई। जीवन जीने के लिए भौतिक साधनों की आवश्यकता है, पर भाव की शुद्धता और पवित्रता से मन को सींचते रहने की भी आवश्यकता होती है। जीवन की निरंतरता के लिए इनकी आवश्यकता को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। भावों की पवित्रता से आपके जीवन को सकारात्मक दिशा मिलती है। सकारात्मक सोच और सकारात्मक चिंतन आपके जीवन को रूपांतरित कर देता है। वस्तुत: ईष्र्या, लोभ, लालच, ¨हसा, नफरत आदि नकारात्मक प्रवृत्तियों को सकारात्मक सोच से ही दूर किया जा सकता है।