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शरीर पर चाबुक के वार और होंठों पर देवी के गीत: कौन हैं 'पोतराज' और क्या है यह सदियों पुरानी परंपरा?

Published: Fri, 23 Oct 2026 05:32 PM (IST)

पोतराज महाराष्ट्र और कर्नाटक के पारंपरिक भक्त हैं जो देवी की स्तुति गाते हुए और रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर गांवों में ...और पढ़ें

महाराष्ट्र और कर्नाटक में ग्राम देवी की पूजा (Picture Credits- AI Images)

महाराष्ट्र और कर्नाटक में ग्राम देवी की पूजा (Picture Credits- AI Images)

HighLights

  1. पोतराज महाराष्ट्र-कर्नाटक के पारंपरिक देवी भक्त हैं।

  2. वे देवी की स्तुति गाते हुए गांवों में घूमते हैं।

  3. चाबुक का उपयोग भक्ति और समर्पण दर्शाता है।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। महाराष्ट्र और कर्नाटक में कुछ लोग जो देवी की स्तुति गाते हुए एक गांव से दूसरे गांव में घूमते हैं, रंग-बिरंगे कपड़े पहनते हैं, हाथ में चाबुक अपने शरीर पर मारते हैं। दरअसल इन्हें 'पोतराज' कहा जाता है।

उनके असामान्य रूप के पीछे सदियों पुरानी एक धार्मिक परंपरा है, जो गांव की देवी-देवताओं से जुड़ी है। पोतराज भक्तों के लिए चाबुक सिर्फ एक वस्तु ही नहीं, बल्कि भक्ति, अनुशासन और देवी के प्रति समर्पण की भावना को दर्शाने का तरीका है।

पोतराज कौन हैं?

पोतराज पारंपरिक भक्त हैं, जो महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों से जुड़े हैं। वे गांव और घरों में जाते हैं, भक्ति गीत गाते हैं और देवी की शक्ति और बुराई पर जीत की कहानियां सुनाते हैं।

उनका जीवन और प्रथाएं क्षेत्रीय लोक परंपराओं और शक्ति पूजा के रूप में काफी गहराई से जुड़ी हुई है। पोतराज को अक्सर रंगीन कपड़ों, खास तरह के गहनों और उनके द्वारा ले जाने वाले चाबुक से पहचाना जाता है।

वे किन देवी-देवता को पूजते हैं?

पोतराज से जुड़ी धार्मिक परंपराओं में रेणुका (जिन्हें परशुराम की माता कहा जाता है) और येल्लम्मा जैसी देवियों की पूजा की जाती है। येल्लम्मा की पूजा खासतौर से महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में प्रमुख हैं।

स्थानीय मान्यताओं में परंपराओं में मारी आई और अंबा के अलग-अलग रूपों जैसी अन्य क्षेत्रीय देवियों की पूजा की जाती है। इन देवियों को आमतौर पर 'शक्ति' यानी दिव्य स्त्री शक्ति का ही रूप माना जाता है।

इनकी पूजा में मंदिर के अनुष्ठान, गांव के त्योहार, लोक गीत और पारिवारिक परंपराएं शामिल होती हैं। कई भक्तों के लिए देवी की सेवा सिर्फ प्रार्थना तक ही सीमित नहीं है, यह उनके दैनिक जीवन का एक खास हिस्सा बन जाती है।

पोतराज कोड़े का इस्तेमाल क्यों करते हैं?

पोतराज परंपरा की सबसे खास पहचान चाबुक है, जिसका इस्तेमाल कुछ भक्तों धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान खुद को मारने के लिए करते हैं। इन क्रियाओं को अनुशासन, तपस्या, मन्नत या देवी के प्रति समर्पण के रूप को दर्शाती है।

हालांकि ऐसा जरूरी नहीं है कि हर पोतराज एक जैसी ही प्रथा का पालन करता है। यह परंपरा अलग-अलग समुदायों में अलग भी हो सकती है। इसे समझने के लिए सिर्फ शारीरिक क्रिया को ही नहीं, बल्कि उस धार्मिक परिवेश को भी देखना जरूरी है।

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