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    सीता नवमी पर जरूर करें माता जानकी की यह भव्य आरती, हर दुख होगा दूर

    Updated: Sat, 25 Apr 2026 08:25 AM (IST)

    सीता नवमी का दिन बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन पूजा-पाठ और व्रत का विधान है। ...और पढ़ें

    Seeta Navami 2026: माता सीता की आरती। (Ai Generated Image)

    Seeta Navami 2026: माता सीता की आरती। (Ai Generated Image)

    HighLights

    1. सीता नवमी का दिन बेहद शुभ माना जाता है

    2. इस दिन मां सीता की पूजा का विधान है

    3. इस दिन लोग व्रत और पूजा-पाठ करते हैं

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि यानी 'सीता नवमी' का दिन बेहद शुभ माना जाता है। इस दिन माता सीता का प्राकट्य हुआ था। शास्त्रों में बताया गया है कि जिस घर में सीता नवमी पर माता जानकी की विधि-विधान से पूजा और आरती की जाती है, वहां कभी दरिद्रता और अशांति का वास नहीं होता। आरती पूजा का वह अंतिम और महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो पूजा को पूर्ण करता है। ऐसे में आइए यहां देवी की भव्य आरती करते हैं, जो इस प्रकार हैं।

    mata sita  (9)

    ।।मां सीता आरती।। (Sita Mata Aarti)

    आरती श्री जनक दुलारी की ।

    सीता जी रघुवर प्यारी की ॥

    जगत जननी जग की विस्तारिणी,

    नित्य सत्य साकेत विहारिणी,

    परम दयामयी दिनोधारिणी,

    सीता मैया भक्तन हितकारी की ॥

    आरती श्री जनक दुलारी की ।

    सीता जी रघुवर प्यारी की ॥

    सती श्रोमणि पति हित कारिणी,

    पति सेवा वित्त वन वन चारिणी,

    पति हित पति वियोग स्वीकारिणी,

    त्याग धर्म मूर्ति धरी की ॥

    आरती श्री जनक दुलारी की ।

    सीता जी रघुवर प्यारी की ॥

    विमल कीर्ति सब लोकन छाई,

    नाम लेत पवन मति आई,

    सुमीरात काटत कष्ट दुख दाई,

    शरणागत जन भय हरी की ॥

    आरती श्री जनक दुलारी की ।

    सीता जी रघुवर प्यारी की ॥

    ।।भगवान राम की आरती।। (Shri Ramchandra Ji Aarti)

    श्री राम चंद्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणम्।

    नवकंज लोचन कंज मुखकर, कंज पद कन्जारुणम्।।

    कंदर्प अगणित अमित छवी नव नील नीरज सुन्दरम्।

    पट्पीत मानहु तडित रूचि शुचि नौमी जनक सुतावरम्।।

    भजु दीन बंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदनम्।

    रघुनंद आनंद कंद कौशल चंद दशरथ नन्दनम्।।

    सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारू अंग विभूषणं।

    आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खर-धूषणं।।

    इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनम्।

    मम ह्रदय कुंज निवास कुरु कामादी खल दल गंजनम्।।

    मनु जाहिं राचेऊ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर सावरों।

    करुना निधान सुजान सिलू सनेहू जानत रावरो।।

    एही भांती गौरी असीस सुनी सिय सहित हिय हरषी अली।

    तुलसी भवानी पूजि पूनी पूनी मुदित मन मंदिर चली।।

    दोहा- जानि गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।

    मंजुल मंगल मूल वाम अंग फरकन लगे।।

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