सावन शिवरात्रि पर भूलकर भी न करें ये गलतियां, रुक सकती है महादेव की कृपा
सावन शिवरात्रि पर शिवलिंग का जलाभिषेक करते समय कुछ गलतियों से बचना बेहद जरूरी है। जानिए पूजा के कौन-से नियम आपको ध्यान रखने चाहिए। ...और पढ़ें

सावन शिवरात्रि पर पूजा के नियम (AI-Generated Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सावन की शिवरात्रि शिव भक्तों के लिए बेहद खास मानी जाती है। इस दिन देशभर के मंदिरों में 'हर हर महादेव' की गूंज होती है और भक्त भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए सुबह से ही जल और दूध चढ़ाने पहुंचते हैं।
माना जाता है कि भक्त द्वारा सच्चे मन से की गई पूजा से मनचाहा वरदान मिलता है, लेकिन कई बार हम अनजाने में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिससे पूजा अधूरी रह जाती है। अगर आप भी इस सावन शिवरात्रि पर व्रत रख रहे हैं या शिवालय जा रहे हैं, तो पूजा के इन नियमों का खासतौर पर ध्यान रखें:
हल्दी-सिंदूर की जगह भस्म और चंदन चुनें
शिवलिंग को वैराग्य और पुरुष तत्त्व का प्रतीक माना जाता है, जबकि हल्दी और सिंदूर सौभाग्य व श्रृंगार की वस्तुएं हैं। इसलिए शिवलिंग पर हल्दी या सिंदूर चढ़ाने के बजाय भस्म, सफेद चंदन या अक्षत अर्पित करना ही शुभ होता है।
केतकी और तुलसी से दूरी बनाएं
भगवान शिव की पूजा में केतकी के फूल कभी नहीं चढ़ाए जाते। पौराणिक कथा के अनुसार, एक असत्य का साक्षी बनने के कारण महादेव ने केतकी के फूल को अपनी पूजा से त्याग दिया था। इसी तरह, तुलसी के पत्ते भी शिवलिंग पर अर्पित न करें। दैत्य जालंधर के वध से जुड़ी कथा के कारण तुलसी दल को शिव पूजा में शामिल नहीं किया जाता।
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खंडित बेलपत्र और शंख का इस्तेमाल न करें
महादेव को बेलपत्र बहुत प्रिय है, लेकिन वह कहीं से कटा-फटा या टूटा नहीं होना चाहिए। बेलपत्र हमेशा साफ-सुथरा और तीन पत्तियों वाला ही अर्पित करना चाहिए। इसके अलावा, शिवपुराण के अनुसार दैत्य शंखचूड़ का वध शिवजी ने किया था, इसलिए शंख से जल या दूध चढ़ाना मना किया जाता है।
तांबे के बर्तन से न चढ़ाएं दूध
अक्सर आपने देखा होगा कि लोग तांबे के लोटे में दूध भरकर शिवलिंग पर चढ़ा देते हैं। लेकिन, शास्त्रों के अनुसार ये बिलकुल गलत है। तांबे के संपर्क में आते ही दूध मदिरा समान अशुद्ध माना जाता है। तांबे के लोटे का इस्तेमाल केवल जल अर्पित करने के लिए करें। दूध चढ़ाने के लिए हमेशा कांस्य, पीतल या चांदी के बर्तन का ही इस्तेमाल करें।
पूरी परिक्रमा कभी न करें
शिवलिंग की पूजा के दौरान कभी भी पूरी परिक्रमा नहीं की जाती। जहां से चढ़ा हुआ जल बाहर निकलता है, उसे 'सोमसूत्र' या 'निर्मली' कहा जाता है। शास्त्रों के मुताबिक, इसे लांघना मना होता है, इसलिए हमेशा आधी परिक्रमा करके वापस घूम जाना चाहिए।
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