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    एक असुर, दो हिस्से और अनंत काल का इंतजार, जानें राहु-केतु के प्रतिशोध की कथा

    Updated: Thu, 26 Feb 2026 04:00 PM (IST)

    सनातन धर्म में ग्रहण राहु-केतु की पौराणिक कथा से जुड़ा है, जब समुद्र मंथन में असुर स्वरभानु ने छल से अमृत पिया। आइए इस कथा को विस्तार से पढ़ते हैं। ...और पढ़ें

    Rahu Ketus: राहु-केतु के प्रतिशोध की कथा। (Ai Generated Image)

    Rahu Ketus: राहु-केतु के प्रतिशोध की कथा। (Ai Generated Image)

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    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    दिव्या गौतम, एस्ट्रोपत्री। सनातन धर्म में ग्रहण को केवल एक खगोलीय घटना नहीं माना जाता, बल्कि इसके पीछे राहु और केतु की एक बहुत ही रोचक पौराणिक कथा छिपी हुई है। समुद्र मंथन के दौरान जब देवताओं और असुरों के बीच अमृत के लिए संघर्ष हो रहा था, तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर अमृत का वितरण किया। स्वरभानु नाम के एक असुर ने देवताओं का रूप धारण कर छल से अमृत पान कर लिया। जैसे ही उसने अमृत की कुछ बूंदें पीं तब ही सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया।

    क्रोधित होकर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उस असुर का सिर धड़ से अलग कर दिया। अमृत के प्रभाव से वह मरा नहीं, बल्कि उसका सिर 'राहु' और धड़ 'केतु' के नाम से अमर हो गया।

    rahu ketu ke janam katha 1

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    राहु-केतु का प्रतिशोध और ग्रहण की आशंका

    अमृत पान के समय जब सूर्य और चंद्रमा ने स्वरभानु असुर की असलियत सबके सामने ला दी, तभी से राहु और केतु उनके प्रति मन में बैर रखते हैं। पुरानी कथाओं में बताया गया है कि राहु इसी का बदला लेने के लिए समय-समय पर सूर्य और चंद्रमा को निगलने की कोशिश करता है, जिसे हम धरती से ग्रहण के रूप में देखते हैं। क्योंकि राहु का सिर और केतु का धड़ अलग-अलग हैं, इसलिए वे इन्हें पूरी तरह अपने भीतर समा नहीं पाते और कुछ ही देर में सूर्य या चंद्रमा फिर से मुक्त होकर चमकने लगते हैं।

    ज्योतिष में ग्रहण के इस समय को बहुत सावधानी वाला माना जाता है क्योंकि वातावरण में नकारात्मकता बढ़ने की आशंका रहती है। इस दौरान ईश्वर का ध्यान करने और मंत्रों का जाप करने से जीवन के संचालन में आने वाली रुकावटें दूर होने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

    जीवन के संचालन और बड़ी इच्छाओं पर प्रभाव

    राहु और केतु को ज्योतिष में छाया ग्रह माना गया है, जो सीधे तौर पर व्यक्ति की मानसिक स्थिति और कार्यों के संचालन को प्रभावित करते हैं। राहु को जहां भ्रम और अचानक होने वाली घटनाओं का कारक माना जाता है, वहीं केतु वैराग्य और अध्यात्म से जुड़ा होता है। ग्रहण के दौरान इन ग्रहों का प्रभाव अत्यंत शक्तिशाली हो जाता है, जिससे निर्णय लेने में सहजता की कमी आ सकती है।

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    विद्वानों का मानना है कि यदि किसी जातक की कुंडली में राहु-केतु का दोष हो, तो ग्रहण के समय विशेष दान-पुण्य करने से कष्ट कम होने की संभावना बढ़ जाती है। ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास और संयम रखने से मनुष्य अपनी बड़ी इच्छाएं पूर्ण करने के मार्ग में आने वाली हर मानसिक आशंका को दूर कर सकता है।

    साधना और खुशियों की नई संभावना

    ग्रहण काल को साधना और 'मेडिटेशन' के लिए सबसे उत्तम समय माना जाता है। इस दौरान किए गए जप और तप से न केवल मन को शांति मिलती है, बल्कि इससे भविष्य में सुख-समृद्धि आने की संभावना भी प्रबल होती है। पुराने समय से ही यह परंपरा रही है कि ग्रहण के सूतक काल में भोजन और शुभ कार्यों से बचा जाए ताकि स्वास्थ्य पर कोई बुरा प्रभाव न पड़े।

    जो लोग नियमपूर्वक इस समय का पालन करते हैं, उनके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ जाता है। राहु और केतु का यह रहस्य हमें सिखाता है कि समय कितना भी कठिन क्यों न हो, यदि हम धैर्य और भक्ति के साथ अपने कर्तव्यों का संचालन करें, तो अंधेरे के बाद उजाले की संभावना हमेशा बनी रहती है।

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    लेखक: दिव्या गौतम, Astropatri.com अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए [email protected] पर संपर्क करें।