समुद्र मंथन से निकली सबसे रहस्यमयी चीज कौन सी थी? भागवत पुराण में मिलता है इसका वर्णन
समुद्र मंथन से 14 दिव्य रत्न निकले थे, लेकिन इनमें से एक ऐसी वस्तु भी थी जिसे सबसे रहस्यमयी माना जाता है। जानिए भागवत पुराण के अनुसार उसका महत्व और रह ...और पढ़ें

समुद्र मंथन का सबसे रहस्यमयी रत्न (AI-Generated Image)
HighLights
समुद्र मंथन से 14 रत्नों की उत्पत्ति हुई थी
इनमें अमृत कलश को सबसे रहस्यमयी माना जाता है
अमृत के लिए देवताओं और असुरों में संघर्ष हुआ था
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। समुद्र मंथन की कथा हिंदू धर्म की सबसे प्रसिद्ध और रहस्यमयी घटनाओं में से एक मानी जाती है। यह केवल देवताओं और असुरों के बीच हुए संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि इसके अंदर जीवन, धैर्य, ज्ञान और आध्यात्मिकता के कई गहरे संदेश भी छिपे हुए हैं।
पुराणों के अनुसार, एक समय ऐसा आया जब देवताओं की शक्ति क्षीण होने लगी और असुर लगातार बलशाली होते गए। तब देवताओं ने भगवान विष्णु से मदद मांगी। भगवान ने उन्हें असुरों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करने की सलाह दी, जिससे अमृत प्राप्त हो सके।
जब शिव ने धारण किया विष
श्रीमद्भागवत पुराण (आठवें स्कंध) के अनुसार, समुद्र मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथनी और नागराज वासुकि को रस्सी बनाया गया। देवता और असुर दोनों ने मिलकर समुद्र को मथना शुरू किया। इस कठिन प्रक्रिया के दौरान एक-एक करके कई दिव्य रत्न प्रकट हुए। इनमें माता लक्ष्मी, कामधेनु गाय, ऐरावत हाथी, उच्चैःश्रवा घोड़ा, कौस्तुभ मणि, पारिजात वृक्ष, चंद्रमा और वारुणी देवी जैसे अनेक अनमोल रत्न शामिल थे। सबसे पहले कालकूट नामक विष भी निकला, जिसने पूरे सृष्टि को संकट में डाल दिया था। तब भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर संसार की रक्षा की और नीलकंठ कहलाए।
हालांकि, समुद्र मंथन से निकले सभी रत्नों का अपना-अपना महत्व है, लेकिन इनमें सबसे रहस्यमयी और महत्वपूर्ण अमृत कलश को माना जाता है। भागवत पुराण के अनुसार, समुद्र मंथन के अंतिम चरण में भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए। उनके हाथों में अमृत से भरा हुआ स्वर्ण कलश था। मान्यता है कि इस अमृत का सेवन करने वाला मृत्यु के भय से मुक्त होकर दीर्घायु और अत्यंत शक्तिशाली बन सकता था।
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जब अमृत बना राहु और केतु ग्रहों की उत्पत्ति का कारण
अमृत के दर्शन होते ही देवताओं और असुरों के बीच उसे पाने की होड़ मच गई। असुर किसी भी कीमत पर अमृत प्राप्त करना चाहते थे। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया। मोहिनी के रूप और बुद्धिमत्ता से मोहित होकर असुरों ने अमृत बांटने का कार्य उन्हें सौंप दिया। भगवान विष्णु ने अपनी दिव्य लीला से अमृत केवल देवताओं को पिला दिया। इसी दौरान स्वरभानु नामक असुर ने छल से अमृत पीने का प्रयास किया, लेकिन उसका भेद खुल गया और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया गया। यही राहु और केतु ग्रहों की उत्पत्ति का कारण माना जाता है।
अमृत कलश को केवल अमरता देने वाली वस्तु नहीं माना जाता, बल्कि यह आध्यात्मिक ज्ञान, आत्मिक उन्नति और जीवन के रहस्यों का भी प्रतीक है। यही कारण है कि समुद्र मंथन से निकले 14 रत्नों में अमृत कलश का स्थान सबसे विशेष और रहस्यमयी माना जाता है।
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