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Meru Trayodashi 2026: कब मनाई जाएगी मेरु त्रयोदशी? तीर्थंकर ऋषभदेव से जुड़ा है यह पर्व

Published: Wed, 14 Jan 2026 07:00 PM (IST)

जैन धर्म में मेरु त्रयोदशी 16 जनवरी 2026 को मनाई जाएगी। यह पर्व प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के निर्वाण से ...और पढ़ें

Meru Trayodashi 2026: मेरु त्रयोदशी का धार्मिक महत्व

Meru Trayodashi 2026: मेरु त्रयोदशी का धार्मिक महत्व

HighLights

  1. 16 जनवरी 2026 को मनाई जाएगी मेरु त्रयोदशी।

  2. प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के निर्वाण से जुड़ा है यह पर्व।

  3. आत्मशुद्धि, तप और आंतरिक प्रगति का प्रतीक है यह तिथि।

दिव्या गौतम, एस्ट्रोपत्री। जैन धर्म में मेरु त्रयोदशी को अत्यंत महत्वपूर्ण और पुण्यकारी तिथि माना जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व माघ मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि, 16 जनवरी को पड़ रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन का विशेष संबंध प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के निर्वाण से जोड़ा गया है।

मेरु त्रयोदशी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, तप और पुण्य का प्रतीक मानी जाती है। जैन समुदाय के अनुयायी इस दिन विशेष साधना, जप, दान और उपवास करते हैं। इसे मनाने का मुख्य उद्देश्य जीवन में आंतरिक शक्ति, आत्मिक प्रगति और धर्म के मार्ग पर दृढ़ता बनाए रखना माना जाता है।

मेरु त्रयोदशी का धार्मिक महत्व

जैन मान्यताओं के अनुसार मेरु पर्वत उच्चता, स्थिरता और श्रेष्ठता का प्रतीक माना जाता है, इसलिए मेरु त्रयोदशी के दिन किए गए पुण्य, तप और साधना को अत्यधिक फलदायी माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि इस दिन साधक सांसारिक इच्छाओं और व्यस्तताओं से दूर रहकर अपने आत्मा की शुद्धि और पूर्व कर्मों के क्षय पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

मेरु त्रयोदशी की पूजा केवल बाहरी अनुष्ठान तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह आत्मिक अनुशासन, संयम और एकाग्रता का संदेश देती है। जैन मुनि और साधक इस दिन विशेष प्रार्थना, ध्यान, जप और दान के माध्यम से अपने भीतर की आंतरिक शक्ति, स्थिरता और धार्मिक जागरूकता का संवर्धन करते हैं।

कब और क्यों मनाई जाती है मेरु त्रयोदशी

मेरु त्रयोदशी माघ मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को पड़ती है, और पंचांग के अनुसार यह तिथि हर वर्ष जनवरी माह में आती है। जैन धर्म में इसे अत्यंत विशेष और पुण्यकारी माना जाता है, क्योंकि यह केवल कैलेंडर आधारित तिथि नहीं, बल्कि तीर्थंकरों के जीवन, शिक्षाओं और निर्वाण से सीधे जुड़ी हुई है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन किए गए अनुष्ठान, साधना, जप और दान सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक फलदायी होते हैं। इसलिए जैन समुदाय के अनुयायी इस तिथि का विशेष ध्यान रखते हैं, व्रत रखते हैं और साधना करते हैं, ताकि आत्मिक प्रगति, आंतरिक शांति और धर्म के मार्ग पर स्थिरता प्राप्त हो सके।

जैन धर्म में मेरु त्रयोदशी का संबंध

मेरु त्रयोदशी का जैन धर्म में अत्यंत गहरा और महत्वपूर्ण संबंध है। यह दिन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के निर्वाण और उनके स्थापित किए धर्म के पालन का स्मरण कराता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन किए गए दान, तप, उपवास और साधना से साधक के पाप नष्ट होते हैं और उसकी आत्मा पर शांति, स्थिरता और मानसिक संतुलन का संचार होता है।

जैन धर्म में मेरु त्रयोदशी केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह जीवन में संयम, आत्मशुद्धि, धार्मिक नियमों का पालन और आध्यात्मिक अनुशासन अपनाने का मार्गदर्शन भी देती है। इस दिन की साधना साधक को आंतरिक शक्ति, एकाग्रता और धर्म मार्ग पर दृढ़ता प्रदान करती है।

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लेखक: दिव्या गौतम, Astropatri.com अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए [email protected] पर संपर्क करें।