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    Margashirsha Amavasya 2025: मार्गशीर्ष अमावस्या पर करें ये विशेष आरती, पितृ दोष से मिलेगी मुक्ति

    Updated: Thu, 20 Nov 2025 08:35 AM (IST)

    मार्गशीर्ष अमावस्या, जिसे अगहन अमावस्या भी कहते हैं। यह तिथि पितरों की शांति, तर्पण, स्नान और दान के लिए विशेष है। इस दिन की गई पूजा-पाठ परम फलदायी मा ...और पढ़ें

    Margashirsha Amavasya 2025: मार्गशीर्ष अमावस्या पर करें ये आरती।

    Margashirsha Amavasya 2025: मार्गशीर्ष अमावस्या पर करें ये आरती।

    HighLights

    1. मार्गशीर्ष अमावस्या आज मनाई जा रही है।

    2. इस दिन स्नान और दान का महत्व है।

    3. यह दिन पितरों को समर्पित है।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। मार्गशीर्ष अमावस्या का दिन बहुत विशेष होता है। इसे अगहन अमावस्या भी कहा जाता है। इस दिन पितरों का तर्पण, स्नान और दान करने से उनकी आत्मा की शांति मिलती है। माना जाता है कि मार्गशीर्ष अमावस्या के दिन की गई पूजा-पाठ परम फलदायी होती है। ऐसे में इस दिन सुबह उठें और स्नान करें। फिर विधिवत पूजा-पाठ और दान-पुण्य करें। अंत में भगवान विष्णु, मां गंगा और विष्णु जी की आरती करें। कहते हैं कि ऐसा करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है, तो चलिए इस दिन (Margashirsha Amavasya 2025) को पावन बनाने के लिए भव्य आरती करते हैं, जो इस प्रकार हैं -

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    ।।पितृ देव की आरती (Pitru Dev Aarti)।।

    जय जय पितर जी महाराज,

    मैं शरण पड़ा तुम्हारी,

    शरण पड़ा हूं तुम्हारी देवा,

    रख लेना लाज हमारी,

    जय जय पितृ जी महाराज, मैं शरण पड़ा तुम्हारी।।

    आप ही रक्षक आप ही दाता,

    आप ही खेवनहारे,

    मैं मूरख हूं कछु नहिं जानू,

    आप ही हो रखवारे,

    जय जय पितृ जी महाराज, मैं शरण पड़ा तुम्हारी।।

    आप खड़े हैं हरदम हर घड़ी,

    करने मेरी रखवारी,

    हम सब जन हैं शरण आपकी,

    है ये अरज गुजारी,

    जय जय पितृ जी महाराज, मैं शरण पड़ा तुम्हारी।।

    देश और परदेश सब जगह,

    आप ही करो सहाई,

    काम पड़े पर नाम आपके,

    लगे बहुत सुखदाई,

    जय जय पितृ जी महाराज, मैं शरण पड़ा तुम्हारी।।

    भक्त सभी हैं शरण आपकी,

    अपने सहित परिवार,

    रक्षा करो आप ही सबकी,

    रहूं मैं बारम्बार,

    जय जय पितृ जी महाराज, मैं शरण पड़ा तुम्हारी।।

    जय जय पितर जी महाराज,

    मैं शरण पड़ा हू तुम्हारी,

    शरण पड़ा हूं तुम्हारी देवा,

    रखियो लाज हमारी,

    जय जय पितृ जी महाराज, मैं शरण पड़ा तुम्हारी।।

    ॥ श्री गंगा मैया आरती ॥

    नमामि गंगे ! तव पाद पंकजम्,

    सुरासुरैः वंदित दिव्य रूपम् ।

    भक्तिम् मुक्तिं च ददासि नित्यं,

    भावानुसारेण सदा नराणाम् ॥

    हर हर गंगे, जय माँ गंगे,

    हर हर गंगे, जय माँ गंगे ॥

    ॐ जय गंगे माता,

    श्री जय गंगे माता ।

    जो नर तुमको ध्याता,

    मनवांछित फल पाता ॥

    चंद्र सी जोत तुम्हारी,

    जल निर्मल आता ।

    शरण पडें जो तेरी,

    सो नर तर जाता ॥

    ॥ ॐ जय गंगे माता..॥

    पुत्र सगर के तारे,

    सब जग को ज्ञाता ।

    कृपा दृष्टि तुम्हारी,

    त्रिभुवन सुख दाता ॥

    ॥ ॐ जय गंगे माता..॥

    एक ही बार जो तेरी,

    शारणागति आता ।

    यम की त्रास मिटा कर,

    परमगति पाता ॥

    ॥ ॐ जय गंगे माता..॥

    आरती मात तुम्हारी,

    जो जन नित्य गाता ।

    दास वही सहज में,

    मुक्त्ति को पाता ॥

    ॥ ॐ जय गंगे माता..॥

    ॐ जय गंगे माता,

    श्री जय गंगे माता ।

    जो नर तुमको ध्याता,

    मनवांछित फल पाता ॥

    ॐ जय गंगे माता,

    श्री जय गंगे माता।

    भगवान विष्णु की आरती (Lord Vishnu Aarti)

    ॐ जय जगदीश हरे आरती

    ॐ जय जगदीश हरे,

    स्वामी जय जगदीश हरे ।

    भक्त जनों के संकट,

    दास जनों के संकट,

    क्षण में दूर करे ॥

    ॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

    जो ध्यावे फल पावे,

    दुःख बिनसे मन का,

    स्वामी दुःख बिनसे मन का ।

    सुख सम्पति घर आवे,

    सुख सम्पति घर आवे,

    कष्ट मिटे तन का ॥

    ॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

    मात पिता तुम मेरे,

    शरण गहूं किसकी,

    स्वामी शरण गहूं मैं किसकी ।

    तुम बिन और न दूजा,

    तुम बिन और न दूजा,

    आस करूं मैं जिसकी ॥

    ॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

    तुम पूरण परमात्मा,

    तुम अन्तर्यामी,

    स्वामी तुम अन्तर्यामी ।

    पारब्रह्म परमेश्वर,

    पारब्रह्म परमेश्वर,

    तुम सब के स्वामी ॥

    ॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

    तुम करुणा के सागर,

    तुम पालनकर्ता,

    स्वामी तुम पालनकर्ता ।

    मैं मूरख फलकामी,

    मैं सेवक तुम स्वामी,

    कृपा करो भर्ता॥

    ॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

    तुम हो एक अगोचर,

    सबके प्राणपति,

    स्वामी सबके प्राणपति ।

    किस विधि मिलूं दयामय,

    किस विधि मिलूं दयामय,

    तुमको मैं कुमति ॥

    ॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

    दीन-बन्धु दुःख-हर्ता,

    ठाकुर तुम मेरे,

    स्वामी रक्षक तुम मेरे ।

    अपने हाथ उठाओ,

    अपने शरण लगाओ,

    द्वार पड़ा तेरे ॥

    ॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

    विषय-विकार मिटाओ,

    पाप हरो देवा,

    स्वमी पाप(कष्ट) हरो देवा ।

    श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,

    श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,

    सन्तन की सेवा ॥

    ॐ जय जगदीश हरे,

    स्वामी जय जगदीश हरे ।

    भक्त जनों के संकट,

    दास जनों के संकट,

    क्षण में दूर करे ॥

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