Mahakal Holi 2026: पूरी दुनिया से पहले महाकाल के आंगन में जलती है होली, क्या है इसके पीछे का रहस्य?
उज्जैन के राजा महाकाल के दरबार में दुनिया से पहले होली की शुरुआत होती है। जानें 3 मार्च को होने वाले होलिका दहन, दिव्य भस्म आरती और महाकाल की इस अद्भु ...और पढ़ें

बाबा महाकाल की होली (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
दिव्या गौतम, एस्ट्रोपत्री। वैसे तो पूरे देश में त्योहार पंचांग के हिसाब से मनाए जाते हैं, लेकिन बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन की बात ही कुछ अलग है। यहां हर उत्सव की शुरुआत सबसे पहले भगवान के आंगन से ही होती है। 3 मार्च 2026 को फाल्गुन पूर्णिमा के दिन भी पूरी दुनिया से पहले महाकाल मंदिर के परिसर में होलिका दहन किया जाता है।
यहां की परंपरा इतनी खास है कि जब तक महाकाल के दरबार में होली की अग्नि नहीं जलती, तब तक पूरे उज्जैन में कहीं और होलिका नहीं जलाई जाती। इसके पीछे लोगों की गहरी आस्था तो है ही, साथ ही यह महादेव की सहजता को भी दिखाता है कि वे ही इस पूरी सृष्टि के स्वामी हैं और हर खुशी की शुरुआत उन्हीं से होनी चाहिए।
राजाधिराज के दरबार से शुरुआत
उज्जैन में महाकाल को वहां का राजा माना जाता है। पुरानी परंपरा के अनुसार, प्रजा अपने राजा के घर उत्सव मनाने के बाद ही अपने घरों में त्योहार मनाती है। यही वजह है कि होलिका दहन के दिन सबसे पहले मंदिर में विशेष पूजा और संध्या आरती होती है। इसके बाद पुजारियों के मंत्रोच्चार के साथ मंदिर प्रांगण की होली जलाई जाती है।
माना जाता है कि महाकाल की अग्नि में आहुति देने से पूरे नगर की नकारात्मक शक्तियां दूर होने की संभावना बढ़ जाती है। इस पावन अग्नि के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु खिंचे चले आते हैं।
शिव और शक्ति का अटूट विश्वास
महाकाल मंदिर की होली केवल लकड़ियों का जलना नहीं है, बल्कि यह शिव और शक्ति के प्रति अटूट विश्वास का पर्व है। मंदिर में होने वाले इस आयोजन में सबसे पहले गुलाल बाबा को अर्पित किया जाता है। जहां दुनिया भर में लोग भद्रा या सूतक को लेकर मन में आशंका पालते हैं।
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वहीं, महाकाल के भक्त उनकी शरण में आकर हर डर से मुक्त हो जाते हैं। बाबा की कृपा ऐसी है कि वे अपने भक्तों के हर दुख को दूर कर देते हैं। इस उत्सव का संचालन मंदिर समिति और पुजारी बड़ी ही भव्यता के साथ करते हैं।
विभूति से शृंगार और दिव्य भस्म आरती
महाकाल की नगरी में होली का उत्सव तब तक पूर्ण नहीं माना जाता, जब तक बाबा अपने भक्तों के साथ भस्म और गुलाल न खेलें। फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या को मंदिर परिसर में होलिका दहन के पश्चात, उस पवित्र अग्नि की राख यानी विभूति को अत्यंत श्रद्धा के साथ एकत्रित किया जाता है। अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त में होने वाली विशेष भस्म आरती में इसी ताजी राख से भगवान महाकाल का दिव्य शृंगार किया जाता है।
भक्तों के मन में यह गहरी आस्था है कि इस पावन भस्म को धारण करने से जीवन की सभी बाधाएं दूर होने की संभावना बढ़ जाती है। यह परंपरा महादेव की सहजता और उनके प्रति अटूट श्रद्धा को दर्शाती है, जहां भक्त अपने आराध्य के साथ रंगों के इस पर्व का संचालन बड़ी ही श्रद्धा के साथ करते हैं।
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लेखक: दिव्या गौतम, Astropatri.com अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए [email protected] पर संपर्क करें।