द्वापर युग से आज तक धड़क रहा है श्रीकृष्ण का हृदय, भारत के इस मंदिर में सुरक्षित रखा है प्रभु का दिल
भगवान श्रीकृष्ण के अंतिम संस्कार में उनका हृदय नहीं जला, जिसे समुद्र में प्रवाहित किया गया। कहां आज भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य हृदय आइए जानते हैं। ...और पढ़ें

भारत के इस मंदिर में धड़कता है भगवान श्रीकृष्ण का हृदय

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवान श्रीकृष्ण श्रीहरि के आठवें अवतार, जिन्होंने द्वापर युग में धरती पर जन्म लिया और करीब 125 साल की आयु में भगवान कृष्ण ने मानव शरीर को त्याग कर बैकुंठ लोक वापस लौट गए। जब पाडंवों ने श्रीकृष्ण के मनुष्य शरीर का अंतिम संस्कार किया, तो एक हैरान कर देने वाली घटना देखने को मिली। अंतिम संस्कार में कृष्ण का शरीर तो पूरी तरह जल गया लेकिन उनका हृदय नहीं जला।
अग्नि के बीच में भी उनका दिल धड़क रहा था। अग्नि ब्रह्मा के दिल को जला पाने में असमर्थ रही। पांडव इस नजारे को देखकर काफी हैरान हुए। उसी दौरान आकाशवाणी हुई कि, यह साधारण हृदय नहीं, बल्कि ब्रह्मा का हृदय है। इसे समुद्र में विसर्जित कर दिया जाए। पांडवों ने भगवान श्रीकृष्ण के हृदय को समुद्र में प्रवाहित कर दिया।
अब की लोग सोचेंगे कि, इस पौराणिक कहानी का आज के समय से क्या लेना है? तो उन्हें यह बात जानकार हैरानी होगी कि, द्वापरयुग में प्रवाहित किया गया है श्रीकृष्ण का हृदय आज भी उसी दिव्यता के साथ धड़क रहा है, जितना कि पहले धड़क रह था। चौकिए मत क्या है इसके पीछे की कहानी आइए जानते हैं विस्तार से।

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भगवान कृष्ण का हृदय कहां पहुंचा?
पौराणिक कथाओं के मुताबिक, जब पांडवों ने भगवान कृष्ण का हृदय जल में प्रवाहित कर दिया, तो वह हृदय बहते-बहते उड़ीसा के पुरी तट पर पहुंच गया। उसी रात पुरी के राजा इंद्रद्युम के स्वप्न में भगवान श्रीकृष्ण ने दर्शन दिए और कहा कि, समुद्र के किनारे मेरा हृदय स्थित है।
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अगली सुबह राजा इंद्रद्युम भगवान श्रीकृष्ण की बताई हुई जगह पर पहुंचे, तो उन्होंने श्रीकृष्ण के हृदय को नमस्कार किया और अपने साथ ले आए।
इसके बाद भगवान के निर्देशों का पालन करते हुए राजा इंद्रद्युम्न ने पवित्र लकड़कियों से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्र की मूर्तियां बनवाईं, और उनमें भगवान श्रीकृष्ण का हृदय (Heart) छिपा दिया।
भगवान के निर्देशों का पालन करते हुए, राजा इंद्रद्युम्न ने पवित्र सामग्री से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की लकड़ी की मूर्तियां बनाईं, और उनमें कृष्ण का दिल छिपा दिया।
12 से 19 साल में नव कलेवर की परंपरा निभाई जाती है
आज भी हर 12 से 19 साल में पुजारियों द्वारा आंखों पर पट्टी बांधकर इस रहस्यमयी और दिव्य हृदय को नई मूर्तियों में स्थापित किया जाता है। इस रस्म को नवकलेवर के नाम से जाना जाता है।
इस दौरान भगवान की नई मूर्ति बनाने के लिए नीम की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। जब नव कलेवर की रस्म निभाई जाती है, तो उस दौरान पूरे शहर की बिजली काट दी जाती है। पुरानी मूर्ति से नई मूर्ति में हृदय को बदलते समय पुजारियों के आंखों में पट्टी और हाथों में दस्ताने होते हैं।
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माना जाता है कि, भगवान श्रीकृष्ण के पवित्र हृदय को गलती से भी किसी ने देख लिया तो, उसकी मौत हो जाएगी। यही कारण है कि नव कलेवर की रस्म अदा करते समय काफी सतर्कता बरती जाती है।
मूर्ति बदलने वाले पुजारियों का मानना है कि, जब भगवान श्रीकृष्ण का हृदय हाथ में लेकर दूसरी मूर्ति में स्थापित किया जाता है, तो ऐसा लगता है कि, कलेवर खरगोश की तरह फुदक रहा है। हालांकि हाथों में मोटे दस्ताने होते हैं, तो काफी कुछ पता नहीं चलता है।
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