कैसे शुरू हुई भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग लगाने की परंपरा? गोवर्धन पर्वत से जुड़ी है यह लीला
जन्माष्टमी (Janmashtami 2026) पर भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग लगाने की परंपरा गोवर्धन पर्वत से जुड़ी है। पौराणिक कथा के ...और पढ़ें

56 भोग के बिना अधूरा है लड्डू गोपाल का भोग (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में जन्माष्टमी के पर्व (Janmashtami 2026) का बहुत महत्व है। यह पर्व आस्था और प्रेम का एक महापर्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।
इसलिए हर साल इस तिथि पर बेहद उत्साह के साथ भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इस खास अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण की विशेष पूजा-अर्चना करने का विधान है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, लड्डू गोपाल की पूजा करने से साधक को जीवन में शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं और प्रभु की कृपा प्राप्त होती है।
इस दिन लड्डू गोपाल को 56 भोग (Lord Krishna 56 Bhog) लगाने का विशेष महत्व है। इससे कृष्ण जी प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर अपनी कृपा बरसाते हैं। अब आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि लड्डू गोपाल को 56 भोग लगाने की क्या वजह है? ऐसे में आइए आपको बताते हैं कि भगवान श्री कृष्ण को 56 भोग लगाने की परंपरा कैसे शुरू हुई।
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(Picture Credit- AI Generated)
कृष्ण जी को क्यों लगाते हैं 56 भोग
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार ब्रजवासी इंद्र देवता की पूजा की तैयारी कर रहे थे। ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण ने माता यशोदा से पूछा कि ब्रजवासी इंद्र देवता की पूजा क्यों करते हैं। माता यशोदा ने कहा कि इंद्र देवता वर्ष करते हैं। जब भगवान श्रीकृष्ण को कारण पता चला, तो उन्होंने कहा कि ब्रजवासियों को इंद्र की पूजा न करके गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए।
ब्रजवासियों ने प्रभु की बात को स्वीकार किया और गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी शुरू कर दी। ब्रजवासियों के इस व्यवहार को देखकर इंद्र देवता को क्रोध आया और उन्होंने पूरे ब्रजमंडल में भयंकर बारिश शुरू कर दी।
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भयंकर बारिश को देखकर ब्रजवासियों की रक्षा करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। तब प्रभु ने ब्रजवासियों को अपनी शरण में लेकर उन्हें बचाया। सात दिनों तक लगातार कृष्ण जी ने गोवर्धन पर्वत को उठाए रखा। इस दौरान उन्होंने अन्न-जल ग्रहण नहीं किया था।
आखिरी इंद्र देवता का अहंकार टूट गया और वर्षा रुक गई। भगवान श्रीकृष्ण के इस कार्य को देखकर ब्रजवासी बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग अर्पित किए। इसके बाद से ही भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग अर्पित करने की परंपरा की शुरुआत हुई। भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग अर्पित करने की परंपरा का उल्लेख श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में मिलता है।
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