हरतालिका तीज: पूजा की चौकी पर क्यों लगाया जाता है 7 फीट का फुलेरा? जानिए क्या कहता है शिव पुराण
हरतालिका तीज की पूजा में फुलेरा बांधने की परंपरा बेहद खास है। जानिए शिव-पार्वती की पूजा में इसके महत्व के बारे में।

शिव-पार्वती की पूजा में इस्तेमाल होने वाले फुलेरा का महत्व (AI-Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को रखा जाने वाला हरतालिका तीज का व्रत सुहागिन महिलाओं और कुंवारी कन्याओं के लिए बेहद खास होता है। दिन भर का निर्जला उपवास और रात में चार प्रहर की पूजा के साथ इस दिन एक खास परंपरा निभाई जाती है- वह है पूजा की चौकी के ऊपर 'फुलेरा' (फुलहरा) बांधना।
लोक मान्यताओं के अनुसार, फुलेरा के बिना हरतालिका तीज (Hartalika teej 2026) की पूजा पूरी नहीं मानी जाती। आइए इस आर्टिकल में पढ़ते हैं कि फुलेरा क्या है और इसका क्या महत्व है।
क्या है फुलेरा और इसका धार्मिक महत्व?
फुलेरा फूलों, लताओं और पत्तियों से तैयार किया गया एक सुंदर छत्र या मंडप होता है, जिसे बालू/मिट्टी से बने पार्थिव शिवलिंग के ठीक ऊपर बांधा जाता है।
दिव्य मंडप का स्वरूप: यह भगवान शिव और माता पार्वती के वैवाहिक मंडप और उनकी छत्रछाया का प्रतीक माना जाता है।
शिव पुत्रियों का प्रतीक: धार्मिक मान्यता के अनुसार, फुलेरा से नीचे लटकने वाली फूलों की लड़ियां भगवान शिव की पांच पुत्रियों (जया, विषहरा, शामिलबारी, देव और दोतली) का प्रतिनिधित्व करती हैं।
मनोकामना पूर्ति: माना जाता है कि फुलेरा के नीचे बैठकर पूजा करने और इसके दर्शन मात्र से दांपत्य जीवन के क्लेश दूर होते हैं और संतान सुख की प्राप्ति होती है। इन प्राकृतिक फूलों और पत्तियों से बनता है फुलेरा पारंपरिक फुलेरा को बनाने में लगभग 4 से 5 घंटे का समय लगता है और इसकी लंबाई करीब 7 फीट तक होती है।
इसमें केवल वही वनस्पतियां उपयोग होती हैं, जो प्रकृति में सहज रूप से खिलती हैं:
प्रमुख फूल: चिलबिनिया, नवकंचनी, सागौर, हनुमंत सिंदूरी, धतूरे का फूल, मदार (आक), बिंजोरी, रांग पुष्प और मौसत पुष्प।
पवित्र पत्तियां: नवबेलपत्र, लज्जावती (छुईमुई), शिल भिटई, शिवताई, हिमरितुली, चरबेर, झानरपत्ती, त्तिलपत्ती और सात प्रकार की शमी पत्तियां।
ये सभी फूल-पत्ते माता पार्वती के उस वन-तप की याद दिलाते हैं, जहां उन्होंने राजसी वैभव छोड़कर सादगी से शिवजी की आराधना की थी।
इसकी पौराणिक मान्यता क्या है?
शिव पुराण के अनुसार, माता पार्वती ने जंगल में रेत का शिवलिंग बनाकर वनस्पति और जंगली फूलों से ही प्रभु का श्रृंगार किया था। फुलेरा उसी वन-पूजन की परंपरा का जीवंत रूप है।
भविष्योत्तर पुराण में वर्णित हरतालिका व्रत विधि और सदियों पुरानी ग्रामीण परंपराओं में मिट्टी के विग्रहों के ऊपर प्राकृतिक पत्तों व फूलों का मंडप (फुलेरा) सजाने का स्पष्ट विधान मिलता है।
यह भी पढ़ें- हरतालिका तीज 2026: किन 4 महिलाओं को नहीं रखना चाहिए यह निर्जला व्रत? जानें क्या कहते हैं शास्त्र
यह भी पढ़ें- Hariyali Teej 2025 Date: सावन में कब किया जाएगा हरियाली तीज का व्रत, अभी नोट करें डेट और शुभ मुहूर्त
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।
