अर्धनारीश्वर के अलावा क्या आप जानते हैं शिव-विष्णु के 'हरिहर' अवतार की कहानी?
भगवान हरिहर शिव और विष्णु का संयुक्त अवतार हैं, जिनकी उत्पत्ति गुहासुर राक्षस के आतंक को समाप्त करने के लिए हुई थी। यह स्वरूप दोनों देवताओं की शक्ति और संरक्षण का प्रतीक है, जिसका संबंध भगवान अय्यप्पा से भी है।

भगवान हरिहर से जुड़ी संपूर्ण जानकारी

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हममें से ज्यादातर लोगों ने भगवान शिव और माता पार्वती के अर्धनारीश्वर अवतार के बारे में जरूर सुना है। लेकिन बहुत कम लोगों को ही भगवान शिव और श्रीहरि के हरिहर अवतार के बारे में पता होगा। हरिहर अवतार भगवान शिव और श्रीविष्णु का प्रतीक है, जिसमें हरि भगवान विष्णु का और हर भगवान शिव का प्रतिनिधित्व करता है।
हिंदू धर्म में दोनों ही देवता अत्यंत पूजनीय हैं, जिन्हें पौराणिक ग्रंथों में संरक्षक के रूप में जाना जाता है। भगवान हरिहर के अस्तित्व से जुड़ी कई दिव्य कथएं हैं। आखिर भगवान शिव और भगवान हरि को यह अवतार क्यों लेना पड़ा और क्या है इसके पीछे की दिव्य कथा? आइए जानते हैं इसके बारे में।
हरिहर भगवान से जुड़ी दिव्य कथा
प्राचीन समय में गुहासुर नाम के एक राक्षस का काफी आतंक था। वह गुहारन्या क्षेत्र पर अन्यायपूर्ण तरीके से शासन करता था। उसने कठिन तपस्या के जरिए भगवान ब्रह्मा से वरदान हासिल किया था। उसकी तपस्या से खुश होकर ब्रह्मा देव ने उसे अजेय होने का वरदान दिया। वरदान पाने के बाद गुहासुर का काफी अहंकारी और अराजक हो गया जिसके कारण वह आए दिन देवताओं और मनुष्यों पर वार करने लगा।
राक्षस के आतंक को देखकर देवताओं ने भगवान विष्णु और भगवान शिव से मदद की गुहार लगाई। गुहासुर के आतंक और देवताओं की गुहार सुनने के बाद दोनों ही ईश्वर मदद के लिए सहमत हो गए, लेकिन बाद उन्हें पता चला कि, भगवान ब्रह्मा के वरदान से लड़ने के लिए उन्हें एक होना होगा। उन्होंने अपने रूप का संयोजन किया, जिसके बाद एक नया स्वरूप सामने आया हरिहर देवता का। इस तरह भगवान विष्णु और भगवान शिव ने उस राक्षस को पराजित किया।
![]()
हरिहर देवता से जुड़ी अन्य कथा
भगवान हरिहर का संबंध भगवान अय्यप्पा से भी है। इसे लेकर अन्य प्रचलित कथाओं के मुताबिक, महिषी नाम की एक राक्षसी थी, उसे वरदान प्राप्त था कि, उसे वरदान मिला था कि, सिर्फ भगवान विष्णु और भगवान शिव के पुत्र ही उसे मार सकते हैं, जोकि अंसभव था। भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लिया। मोहिनी और भगवान शिव के मिलन से भगवान अय्यप्पा का जन्म हुआ। लोग भगवान अय्यप्पा को हरिहर पुत्र के नाम से भी जानते हैं। यह कथा भगवान शिव और भगवान हरि की शक्ति का वर्णन करती है।
भगवान हरिहर का स्वरूप
भगवान हरिहर का स्वरूप दिखने में बेहद आकर्षक और खास है, क्योंकि इसमें भगवान विष्णु और शिव का संयोजन दिखाई देता ह। जहां एक भाग भगवान शिव को दर्शाता है। जिसमें जटाधारी बाल, अर्धचंद्र और गंगा नदी शामिल हैं। वे हाथों में त्रिशूल धारण किए हुए हैं और सांपों का आभूषण पहने हुए हैं।
वहीं, दूसरा भाग भगवान विष्णु की छवि को दर्शाता है। जिसमें विष्णु जी मुकुट रत्नों से सजे हैं। लोग इस मुकुट को कीर्ति मुकुट भी कहते हैं। वे अपने हाथों में चक्र और शंख लिए हुए हैं। उनके आभूषण और मुद्रा एक शांत भाव को दर्शाती है। भगवान विष्णु संरक्षण और रक्षा के प्रतीक हैं।
हरिहर को समर्पित मंदिर
कर्नाटक के हरिहर नगर में बसा है हरिहरेश्वर मंदिर जो वहां के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। यह मंदिर भगवान शिव और भगवान विष्णु के संयुक्त रूप को समर्पित है, जो कि तुंगभद्रा नदी के किनारे बसा है। मंदिर की वास्तुकला काफी मन मोह लेने वाली है। यह भगवान शिव और भगवान विष्णु के भक्त एक साथ पूजा करते हैं। यह मिलन शैव और वैष्णव धर्म के बीच शांति स्थापित करन के लिए जाना जाता है।
यह भी पढ़ें- क्या आपको भी मिल रहे हैं ये संकेत? समझ लें आ गया है मां वैष्णो देवी का बुलावा!
यह भी पढ़ें- कौन हैं मां वाग्देवी जिनकी 11वीं सदी की मूर्ति ब्रिटेन से वापस लाने की हो रही है कोशिश?
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।

