चाणक्य नीति: धरती पर ही स्वर्ग का सुख पाते हैं ऐसे लोग, इन 4 आदतों वाले भोगते हैं नरक का दुख
आचार्य चाणक्य के अनुसार, स्वर्ग और नरक का भोग कर धरती पर जन्म लेने वाले मनुष्यों में कुछ खास लक्षण होते हैं। जानिए चाणक्य नीति के इन श्लोकों का अर्थ। ...और पढ़ें
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जीवन को बर्बाद करने वाली 4 आदतें

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। धर्म और नीति शास्त्र की बात हो और आचार्य चाणक्य का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं है। आचार्य चाणक्य को महान राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ और विद्वान माना जाता है। उनके विचार आज भी लोगों को जीवन में सही दिशा दिखाते हैं। उन्होंने अपनी रचना नीति शास्त्र में व्यक्ति के गुण और अवगुणों के बारे में विस्तार से बताया है।
आचार्य चाणक्य के अनुसार, व्यक्ति का स्वभाव और व्यवहार ही उसकी पहचान होता है। कुछ लोग अपने अच्छे कर्मों से जीवन में सुख और सम्मान प्राप्त करते हैं, जबकि कुछ लोग अपने अवगुणों के कारण हमेशा दुखी रहते हैं।
स्वर्गस्थितानामिह जीवलोके चत्वारि चिह्नानि वसन्ति देहे।
दानप्रसङ्गो मधुरा च वाणी देवार्चनं ब्राह्मणतर्पणं च॥
अर्थ: आचार्य चाणक्य अपनी रचना चाणक्य नीति के सातवें अध्याय के सोलहवें श्लोक में कहते हैं कि जो लोग स्वर्ग का सुख भोगकर धरती पर जन्म लेते हैं, उनमें चार खास गुण होते हैं। ऐसे लोग मीठा बोलते हैं, दान-पुण्य करते हैं, भगवान की भक्ति करते हैं और ब्राह्मणों को दान देते हैं। चाणक्य के अनुसार ऐसे लोग जीवन में सुख और सम्मान प्राप्त करते हैं।
अत्यंतकोप: कटुका च वाणी दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम्।
नीचप्रसंग: कुलहीन सेवा चिह्ननानि देहे नरक स्थितानाम।।
अर्थ: आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जो लोग नरक का दुख भोगकर धरती पर जन्म लेते हैं, उनमें कुछ बुरे गुण पाए जाते हैं। ऐसे लोग कड़वा बोलते हैं, गलत लोगों की संगति करते हैं, परिवार और दोस्तों से दुश्मनी रखते हैं और जीवनभर परेशान रहते हैं। चाणक्य के अनुसार, ऐसे लोगों को इस लोक और परलोक दोनों जगह सुख नहीं मिलता।

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माता च कमला देवी पिता देवो जनार्दनः।
बान्धवा विष्णुभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम्॥
अर्थ: इसी अध्याय के चौदहवें श्लोक में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जिन लोगों पर मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कृपा होती है और जिनके परिवार में भक्ति और प्रेम का वातावरण होता है, वे लोग धरती पर ही स्वर्ग जैसा सुख पाते हैं। ऐसे लोग जीवन में खूब तरक्की करते हैं और सम्मान प्राप्त करते हैं।
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आत्मद्वेषात् भवेन्मृत्यु: परद्वेषात् धनक्षय:।
राजद्वेषात् भवेन्नाशो ब्रह्मद्वेषात् कुलक्षय:।।
अर्थ: आचार्य चाणक्य अपनी रचना चाणक्य नीति के दसवें अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में कहते हैं कि जो व्यक्ति खुद से नफरत करता है, उसका जीवन धीरे-धीरे बर्बाद हो जाता है। वहीं, दूसरों की संपत्ति से ईर्ष्या करने वाले लोग कभी तरक्की नहीं कर पाते। चाणक्य के अनुसार राजा या विद्वानों से दुश्मनी रखने वाले लोगों का भी अंत अच्छा नहीं होता और उन्हें जीवन में हमेशा दुख झेलना पड़ता है।
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