स्वस्तिवाचन मंत्र क्या है? पूजा की शुरुआत और अंत में क्यों किया जाता है इसका पाठ; पढ़ें महत्व
हिंदू धर्म में स्वस्तिवाचन मंत्र का विशेष महत्व है, जो कल्याण और शांति का प्रतीक है। यह मंत्र पूजा और ...और पढ़ें

स्वस्तिवाचन मंत्र का महत्व और पूजा में इसका सही उपयोग जानें। (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत कई वैदिक मंत्रों के उच्चारण से की जाती है। इनमें स्वस्तिवाचन मंत्र का विशेष महत्व माना जाता है। 'स्वस्ति' शब्द का अर्थ है कल्याण, मंगल और शुभता। इसलिए स्वस्तिवाचन का भाव है, सबका मंगल हो, सभी सुरक्षित रहें और सभी के जीवन में शांति बनी रहे।
यह मंत्र वैदिक परंपरा से जुड़ा है और पूजा, हवन तथा धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान इसका पाठ किया जाता है। चलिए हम आपको इसका महत्व बताते हैं।
क्या है स्वस्तिवाचन मंत्र?
स्वस्तिवाचन में देवताओं से सुख, शांति, सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण की प्रार्थना की जाती है। इस मंत्र में अलग-अलग देव शक्तियों से जातक अपने और समाज के कल्याण की कामना करताहै। यह मंत्र कुछ इस प्रकार है-
"ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥"
मंत्र में किन देवताओं का स्मरण होता है?
स्वस्तिवाचन मंत्र में इंद्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति जैसी दिव्य शक्तियों से जातक अपने जीवन के कल्याण की प्रार्थना करता है। आपको बता दें कि मंत्र जाप की मदद से देवराज इंद्र से शक्ति और सुरक्षा, पूषा से मार्गदर्शन और पोषण तथा बृहस्पति से ज्ञान और शुभ बुद्धि की कामना की जाती है। इस प्रकार पूरे मंत्र के जाप के साथ व्यक्ति अपने कल्याण की भावना को व्यक्त करता है।
पूजा की शुरुआत में क्यों किया जाता है स्वस्तिवाचन मंत्र का जाप ?
पूजा या अनुष्ठान की शुरुआत में स्वस्तिवाचन मंत्र का जाप करने का उद्देश्य मंगल की कामना और मन को पूजा के लिए तैयार करना माना जाता है। मंत्रों के उच्चारण से वातावरण में शांति और एकाग्रता का भाव पैदा होता है। कई पूजा विधियों में स्वस्तिवाचन के दौरान जल से आचमन भी किया जाता है। इसे शुद्धि और मंगल का प्रतीक माना जाता है।
पूजा के अंत में क्यों किया जाता है स्वस्तिवाचन मंत्र का जाप ?
कुछ पूजा और अनुष्ठानों में स्वस्तिवाचन या शांति मंत्रों का पाठ उनके समापन पर भी किया जाता है। इसका उद्देश्य सभी के सुख, शांति और कल्याण की प्रार्थना करना होता है। अंत में 'ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः' का उच्चारण करके मन, वातावरण और जीवन में शांति की कामना की जाती है।
अत: सकारात्मक भावना से इस मंत्र का जाप किया जाए, तो जातक के जीवन में खुशहाली बनी रहती है।
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