Ganesh Atharvashirsha: भालचंद्र संकष्टी पर जरूर करें गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ, पल भर में दूर करेंगे कष्ट
जानें विघ्नहर्ता भगवान गणेश के 'गणेश अथर्वशीर्ष' (Ganesh Atharvashirsha Stotra) के पाठ का वह चमत्कारिक उपाय, जिससे जीवन के सभी दुख, संताप और बाधाएं दू ...और पढ़ें

Ganesh Atharvashirsha Stotra: गणेश अथर्वशीर्ष (Image Source: Freepik)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। Ganesh Atharvashirsha Stotra: सनातन धर्म में बुधवार का दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश को अत्यंत प्रिय है। शिव-पार्वती के लाडले गजानन की इस दिन विशेष रूप से पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से बप्पा की आराधना करता है, उसके जीवन के सारे कष्ट और विघ्न दूर हो जाते हैं।
6 मार्च 2026 को भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर आप भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी के दिन 'गणेश अथर्वशीर्ष' (Bhalchandra Sankashti Chaturthi 2026) का पाठ करते हैं तो कष्टों से मुक्ति मिलती है और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
'गणेश अथर्वशीर्ष' का महत्व और नियम
मनचाही सिद्धि: किसी विशेष कार्य में सफलता या मनोकामना पूर्ति के लिए कई साधक बुधवार के दिन व्रत भी रखते हैं।
बप्पा का प्रिय भोग: भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए पूजा में उन्हें दूर्वा (हरी घास) और मोदक या लड्डू का भोग जरूर अर्पित करना चाहिए।
सुख-समृद्धि में वृद्धि: बप्पा की कृपा से घर-परिवार में सुख, शांति और धन-धान्य का वास होता है और हर तरह के संकट कट जाते हैं।

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।। अथ श्री गणपति अथर्वशीर्ष स्तुति ।।
ॐ नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि।।
त्वमेव केवलं कर्त्ताऽसि।
त्वमेव केवलं धर्तासि।।
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।।
त्वं साक्षादत्मासि नित्यम्।
ऋतं वच्मि।। सत्यं वच्मि।।
अव त्वं मां।। अव वक्तारं।।
अव श्रोतारं। अवदातारं।।
अव धातारम अवानूचानमवशिष्यं।।
अव पश्चातात्।। अवं पुरस्तात्।।
अवोत्तरातात्।। अव दक्षिणात्तात्।।
अव चोर्ध्वात्तात।। अवाधरात्तात।।
सर्वतो मां पाहिपाहि समंतात्।।
त्वं वाङग्मयचस्त्वं चिन्मय।
त्वं वाङग्मयचस्त्वं ब्रह्ममय:।।
त्वं सच्चिदानंदा द्वितियोऽसि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि।।
सर्व जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्व जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्व जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।।
सर्व जगदिदं त्वयि प्रत्येति।।
त्वं भूमिरापोनलोऽनिलो नभ:।।
त्वं चत्वारिवाक्पदानी।।
त्वं गुणयत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।
त्वं देहत्रयातीत: त्वं कालत्रयातीत:।
त्वं मूलाधार स्थितोऽसि नित्यं।
त्वं शक्ति त्रयात्मक:।।
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यम्।
त्वं शक्तित्रयात्मक:।।
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं।
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुव: स्वरोम्।।
गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।।
अनुस्वार: परतर:।। अर्धेन्दुलसितं।।
तारेण ऋद्धं।। एतत्तव मनुस्वरूपं।।
गकार: पूर्व रूपं अकारो मध्यरूपं।
अनुस्वारश्चान्त्य रूपं।। बिन्दुरूत्तर रूपं।।
नाद: संधानं।। संहिता संधि: सैषा गणेश विद्या।।
गणक ऋषि: निचृद्रायत्रीछंद:।। गणपति देवता।।
ॐ गं गणपतये नम:।।
गणेश जी के मंत्र
ॐ ग्लौम गौरी पुत्र, वक्रतुंड, गणपति गुरु गणेश।
ग्लौम गणपति, ऋद्धि पति, सिद्धि पति. करो दूर क्लेश ।।
महाकर्णाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।।
गजाननाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।।
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