यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 09, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
लोक की जात, परलोक का सुख
गढ़वाल के राजाओं की भांति कुमाऊं के चंद राजाओं की कुलदेवी भी नंदा है, सो दोनों क्षेत्रों के लोग अपनी धियाणियों (विवाहित बहन, बेटी, बुआ आदि) को नंदा का ...और पढ़ें

देहरादून, जागरण संवाददाता। गढ़वाल के राजाओं की भांति कुमाऊं के चंद राजाओं की कुलदेवी भी नंदा है, सो दोनों क्षेत्रों के लोग अपनी धियाणियों (विवाहित बहन, बेटी, बुआ आदि) को नंदा का ही स्वरूप ही मानते हैं। नंदा उनके लिए साकार (प्रत्यक्ष) है, बिल्कुल बरसाने की राधा की तरह। तभी तो रहस्य, रोमांच एवं सुख-दुख से भरी गाथाओं में नंदा एक ऐसी युवती के रूप में उभरकर सामने आती है, जिसकी आम पहाड़ी लड़की की तरह शादी हुई और हर बार मायके आने के बाद ससुराल जाना पड़ा। इस पर वह अपने सगे-संबंधियों से बिछुड़ने पर दुखी होती है, रूठती है, मनाई जाती है।
देखा जाए तो श्री नंदा देवी राजजात सिर्फ आस्था की यात्रा ही नहीं, माता-पिता की अपनी ब्याहता बेटियों के प्रति स्नेह का प्रतीक भी है। इसीलिए जब नंदा को अपनी ससुराल लौटना होता है तो वह हठीली और जिद्दी देवी बन जाती है। जिसकी परिणति कुछ मनोरंजक गतिज प्रभावों में होती है। असल में स्त्री मन ने अपनी जीवन यात्रा के कष्टों को नंदा के जीवन में समाहित कर उसे अपनी तरह ही बना दिया। विलियम एस. सैक्स ने अपनी पुस्तक 'हिमालय की नंदा' में लिखते हैं, 'पहाड़ की नारी को ससुराल में अनगिनत कष्ट सहने पड़ते थे। उस दस बरस तक कठोर प्रोवेशन (परिवीक्षा) पर रखा जाता है। हर घर में बेटी एवं बहू के लिए अलग-अलग नियम-कायदे थे। जहां बेटी के लिए दूध-भात था, वहीं बहू के लिए मोटा-सोटा खाना।'
प्रो. डीआर पुरोहित के अनुसार, ससुराल के कष्टों से छुटकारा पाने के लिए पहाड़ की बेटी को मायके जाने की तीव्र वेदना होती थी, जिसे खुद लगना कहा जाता था। किंतु मायके लौटने के लिए उसके पास पौष के महीने में 30 दिन का अर्जित अवकाश, भादौं के महीने में 15 दिन का विशेष अवकाश और जेठ के महीने में सात दिन का आकस्मिक अवकाश होता था। इसके बावजूद किसी खास विपत्ति में ही उसे मायके जाने की अनुमति मिलती थी।
डॉ. पुरोहित कहते हैं कि इन्हीं परिस्थितियों ने धियाणियों के हृदय में असीम वेदना का संसार रचाया। इसकी अभिव्यक्ति चैती, बगड्वाली, छूड़ा-पंवाड़ा, लामण इत्यादि गीतों में हुई, जिन्हें खुदेड़ गीत के नाम से जाना गया। नंदा के जागरों का भी देवभूमि में यही रूप है। वह हमारी धियाण है और उसकी ससुराल की दिनचर्या एवं अस्तित्व हम जैसा ही है। वही दर्द, वेदना और खुद। 'उत्तराखंड में नंदा देवी के उत्सव एवं जात परंपरा' में जयप्रकाश पंवार 'जेपी' लिखते हैं कि 'नंदा पहाड़ों की ऊंची-नीची ढलानों, पगडंडियों, खेत-खलिहानों, फूलों से लकदक घाटियों, झरनों, सरसराते बुग्यालों के सुमधुर संगीत को सुनते-सुनते, सखियों संग अठखेलियां करते-करते ससुराल चली गई। और.. अपने पीछे एक मार्मिक याद पर्वतवासियों के मनोमस्तिष्क पर छोड़कर सदा के लिए 'पहाड़ की धियाण' के रूप में जानी जाने लगी।'
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वह कहते हैं कि न जाने नंदा कहां, किस रूप में दृष्टिगोचर हो जाए, कहा नहीं जा सकता। तभी तो पर्वतराज हिमालय के विस्तृत फैले प्रदेश में नंदा की याद कथाओं, जागर, गीत, नृत्य, पर्व, जात, यात्राओं, मंदिरों से जुड़ी कथाओं, शक्ति-पूजा स्थलों के रूप में की जाती है। नंदा को अपने मैत हिमालय का वह स्थान प्रिय है, जहां उसने जीवन के स्वच्छंद-उमंग से भरे हंसी-खुशी के दिन बिताए थे।