आखिर लोग ऐसा क्यों कहते हैं कि महाकाल के दरबार में समय रुक जाता है?
मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर धाम में प्रवेश करते ही भक्त समय की चिंताएं भूल जाते हैं, क्योंकि महाकाल समय, मृत्यु और अनंत काल से परे हैं।


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर धाम को लेकर लोगों का मानना है कि, मंदिर में प्रवेश करते ही समय, चिताएं, भविष्य का डर, अतीत का पछतावा सब कुछ गायब होने लगता है।
ऐसा इसलिए क्योंकि महाकाल सिर्फ भक्ति से ही नहीं जुड़े हैं, बल्कि वे समय, मृत्यु, अनंत काल और इस सच्चाई से जुड़े हैं कि जीवन में सब कुछ आखिर में खत्म हो जाता है।
महाकाल मंदिर का असल रहस्य
महाकाल भगवान का नाम दो शब्दों के मेल से बना है, जिसमें महा का अर्थ है महान और काल का अर्थ है समय। महाकाल शिव का वह रूप हैं जो जन्म, मौत और समय की सीमाओं से भी परे हैं। इसीलिए भक्तों का मानना है कि, महाकालेश्वर मंदिर अन्य मंदिरों से अलग है।
यह एक ऐसी जगह है जहां लोग कुछ समय के लिए समय की चिंता छोड़ देते हैं। जब कोई महाकाल के सामने खड़ा होता है, तो उसे याद दिलाया जाता है कि रोजमर्रा का समस्त तनाव, काम का दबाव और जीवन में मची उथल-पुथल कुछ पल के लिए है।
उज्जैन और समय के बीच का संबंध
उज्जैन शहर का समय और खगोल विज्ञान से गहरा नाता है। प्राचीन भारत में उज्जैन को ग्रहों, पंचांगों और तारों की गति के अध्ययन का प्रमुख केंद्र माना जाता था। कई विद्वानों का मानना है कि, इसी एक कारण से महाकाल शहर के प्रमुख देवता बन गए।
चूंकि उज्जैन का समय समय मापने से था, इसी वजह से महाकाल स्वाभाविक रूप से शहर के रक्षक बन गए। यह संबंध मंदिर को भी भी ज्यादा रहस्यमय बना देता है क्योंकि इसमें आध्यात्मिक और इतिहास दोनों की भागीदारी है।

महाकाल में समय रुकने का असल मतलब
जब लोग कहते हैं कि, महाकालेश्वर मंदिर में समय रुक जाता है, तो इसका मतलब यह कतई नहीं होता कि, घड़ियां चलना बंद कर देती हैं। उनका मतलब होता है कि, मंदिर के अंदर का वातावरण इतना दैवीय, ऊर्जावान और सकारात्मक है कि, लोग सब कुछ भूल जाते है।
कई श्रद्धालु बताते हैं कि, मंदिर में प्रवेश करते ही समय का पता नहीं चलता। वहीं कुछ अन्य श्रद्धालु कहते हैं कि, महाकाल के दर्शन करने पर अचानक काम, पैसा, समस्याएं और जिम्मेदारियों के बारे में सोचना बंद कर देते हैं।
शिव नगर की रक्षा के लिए प्रकट हुए
प्राचीन कथाओं में वर्णन देखने को मिलता है कि, उज्जैन पर एक बार दुशना नाम के राक्षस ने हमला कर दिया था। आम जन से लेकर साधु-संत तक इस राक्षस के आतंक से परेशान थे। लोगों ने भगवान शिव से सहायता की प्रार्थना की।
ऐसा माना जाता है कि, शिव उग्र रूप में पृथ्वी पर प्रकट हुए और राक्षस का नाश किया। उज्जैन को बचाने के बाद शिव महाकाल के रूप में वहीं निवास करने लगे ताकि अपने भक्तों की रक्षा करते रहें। यह कहानी उन कारणों में से एक है जिनकी वजह से लोग मंदिर में आने पर इतना सुरक्षित और जुड़ाव महसूस करते हैं। कई लोगों का मानना है कि, महाकाल को दूर स्थान पर निवास करने वाले देवता नहीं हैं, बल्कि वे एक संरक्षक की भूमिका अदा करते हैं ताकि हर भक्त को उनकी उपस्थिति का एहसास हो सकें।
मंदिर के अनुष्ठान किस बात का प्रतीक
महाकालेश्वर मंदिर में सबसे प्रसिद्ध अनुष्ठानों में से एक भस्म आरती जिसमें भगवान शिव को पवित्र राख अर्पित किया जाता है। राख इस बात का प्रतीक है, कि जीवन में सब कुछ आखिर में धूल में मिल जाता है। धन, सौंदर्य, नाम, सफलता सब कुछ क्षणिक मात्र है।
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है जिसका मुख दक्षिण दिशा की ओर है। हिंदू मान्यताओं में दक्षिण दिशा को यम से जोड़कर देखा जाता है। चूंकि महाकाल को मौत से भी अधिक शक्तिशाली माना गया है, इसलिए दक्षिणमुखी यह प्रतिमा शिव की डर, अंत और नश्वरता पर जीत का प्रतीक है। भक्तों का मानना है कि, यहां मत्था टेकने से मुश्किल समय में हिम्मत, आंतरिक शांति और शक्ति की प्राप्ति होती है।
यह भी पढ़ें- सावन में महाकाल के दर्शन: भारत के एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा और अनुष्ठान
यह भी पढ़ें- उज्जैन के महाकाल मंदिर में भस्म आरती ब्रह्म मुहूर्त में ही क्यों होती है? जानिए इसके पीछे का रहस्य
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।

