3580 मीटर की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ मंदिर में क्या-क्या है खास? पढ़ें धाम से जुड़ी हर जानकारी
केदारनाथ मंदिर भारत का पांचवां ज्योतिर्लिंग है, जो उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में स्थित है और आदि शंकराचार्य द्वारा निर्मित माना जाता है। ...और पढ़ें

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग से जुड़ी संपूर्ण जानकारी
HighLights
भारत का पांचवां ज्योतिर्लिंग, उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में स्थित।
आदि शंकराचार्य द्वारा निर्मित, महाभारत काल से जुड़ा पौराणिक महत्व।
स्वयंभू ज्योतिर्लिंग और पंच केदारों में प्रमुख स्थान रखता है।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भारत का पांचवां ज्योतिर्लिंग केदारनाथ मंदिर हिंदू धर्म से जुड़े लोगों के लिए अत्यंत पवित्र स्थल है, जो उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय की गोद में बसा है। 3580 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर अपने आप में भव्यता का प्रतीक है।
यहां भक्तगण भगवान शिव का आशीर्वाद लेने के लिए आते हैं। मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा कराया गया था। मंदिर के पास मंदाकिनी नदी का मनोरम दृश्य इसकी सुंदरता को और निखारने का काम करता है।
केदारनाथ मंदिर न सिर्फ द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है, बल्कि पंच केदारों में भी सबसे प्रमुख माना जाता है। इसके अलावा यह देवभूमि उत्तराखंड के प्रसिद्ध छोटे 4 धाम यात्रा का भी अहम हिस्सा है।
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केदारनाथ मंदिर का महाभारत काल से संबंध
बताया जाता है कि, महाभारत काल में जब पांडवों ने कुरुक्षेत्र युद्ध कौरवों को हरा दिया था, तो अपने ही सगे-संबंधियों की हत्या से आहत होकर उन्होंने भगवान शिव से क्षमा-प्रार्थना की। भगवान शिव उनसे बचते रहे और आखिर में केदारनाथ पहुंचे जहां उन्होंने भैंसे का रूप धारण करके विलीन हो गए। ऐसा माना जाता है कि, यह मंदिर उसी स्थान पर स्थित है जहां भगवान शिव विलीन हुए थे। मंदिर के अंदर शिवलिग पृथ्वी, जल, हवा और अग्नि तत्वों द्वारा प्राकृतिक रूप से निर्मित हुआ है।
इसके अलावा केदारनाथ से जुड़ी अन्य कथा बताती हैं कि, ऋषि नारा और नारायण ने कई सालों तक केदारनाथ धाम में ध्यान किया और भगवान शिव उनकी भक्ति से इतने खुश हुए कि उन्होंने उन्हें मंदिर में एक स्थायी निवास स्थान प्रदान किया।
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मंदिर के गर्भ गृह में स्वयंभू ज्योतिर्लिंग
मंदिर के गर्भ गृह में भगवान भोले नाथ का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग एक विशाल शिला के रूप में मौजूद है। गर्भ गृह के बाहर मां पार्वती की पाषाणमूर्ति है और सभामंडप में पंच पांडव, श्रीकृष्ण एवं माता कुंती जी की मूर्तियां हैं। मुख्य द्वार पर गणेश जी और श्री नंदी जी की पाषाण मूर्तियां हैं। परिक्रमा पथ में अमृत कुंड है। इसी पथ के पूर्व भाग पर भैरवनाथ जी की पाषाण मूर्तियां हैं और करीब 50 मीटर उत्तर-पश्चिम की ओर शंकराचार्य की समाधि है।
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