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क्या पंजाब में कांग्रेस दोहराएगी अपना इतिहास? राहुल गांधी के दौरे से पहले हाईकमान के फैसले पर टिकी सबकी नजर

Published: Sat, 08 Aug 2026 05:08 PM (IST)

पंजाब कांग्रेस में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बढ़ती गुटबाजी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। हाईकमान ...और पढ़ें

क्या पंजाब में कांग्रेस दोहराएगी अपना इतिहास?

क्या पंजाब में कांग्रेस दोहराएगी अपना इतिहास?


HighLights

  1. पंजाब कांग्रेस में 2027 चुनाव से पहले गुटबाजी बढ़ी।

  2. भूपेश बघेल, राजा वड़िंग के कार्यक्रमों में विरोध प्रदर्शन।

  3. हाईकमान राहुल गांधी के दौरे से विवाद शांत करने की कोशिश।

राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी कांग्रेस के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती विपक्षी दल नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ती गुटबाजी बन गई है। प्रदेश कांग्रेस प्रभारी भूपेश बघेल और प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के कार्यक्रमों में विरोध, नारेबाजी और पोस्टरबाजी ने अंदरूनी कलह को सार्वजनिक कर दिया है।

बीते दस दिनों में पंजाब के विभिन्न जिलों में हुई बैठकों में भी विरोध और नारेबाजी के बाद स्थिति तनावपूर्ण हो चुकी है। बघेल इस समय पंजाब दौरे पर हैं और 18 जिलों में ब्लाक और जिला स्तर पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर रहे हैं।

सभी गुटों को साथ रखने की कोशिश 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस हाईकमान चरणजीत सिंह चन्नी समर्थकों द्वारा कार्यक्रमों में हो रही अनुशासनहीनता पर सख्त कार्रवाई करेगा? पार्टी के भीतर फिलहाल यह संकेत जरूर हैं कि हाईकमान नेतृत्व परिवर्तन के बजाय विवाद को नियंत्रित करने और सभी गुटों को साथ रखने की कोशिश करेगा।

जुलाई में चंडीगढ़ दौरे पर बघेल साफ कर चुके हैं कि राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखने का फैसला हो चुका है और नेतृत्व परिवर्तन का सवाल नहीं है।

पंजाब कांग्रेस में एक तरफ वड़िंग और प्रताप सिंह बाजवा का नेतृत्व है, तो दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थक लगातार अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। सुखजिंदर सिंह रंधावा भी पार्टी के भीतर मजबूत भूमिका की तलाश में हैं।

संगठन को असहज परिस्थितियों का करना पड़ा सामना

चन्नी के सामने भी राजनीतिक रूप से आसान विकल्प नहीं हैं। कांग्रेस छोड़ना उनके लिए जोखिम भरा हो सकता है, जबकि पार्टी के भीतर रहते हुए मौजूदा नेतृत्व से टकराव उन्हें अलग धड़े की राजनीति तक ले जा सकता है। कांग्रेस में पहले भी नवजोत सिंह सिद्धू जैसे नेताओं की मुखर और स्वतंत्र राजनीति से संगठन को असहज परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है।

भूपेश बघेल के पंजाब दौरे के दौरान कथित तौर पर 'आरएसएस के स्लीपर सेल' जैसे आरोपों और विरोध ने विवाद को और बढ़ाया है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक बघेल पूरे घटनाक्रम पर रिपोर्ट हाईकमान को जल्द रिपोर्ट सौंपेंगे। पंजाब कांग्रेस में अब सभी की नजरे अब नजरें राहुल गांधी पर हैं। पंजाब में उनके संभावित दौरे से पहले हाईकमान विवाद को शांत करने की कोशिश कर रहा है।

वड़िंग को हटाए जाने की संभावना फिलहाल कम 

राहुल गांधी के खिलाफ फिलहाल किसी गुट की खुली नाराजगी सामने नहीं आई है। यही कारण है कि उनकी भूमिका सभी धड़ों को एक मंच पर लाने में अहम हो सकती है। कांग्रेस में वड़िंग को हटाए जाने की संभावना फिलहाल कम दिखाई देती है, क्योंकि हाईकमान ने भी हाल ही में उन्हें बनाए रखने का फैसला दोहराया है।

ऐसे में कार्रवाई का स्वरूप नेतृत्व परिवर्तन के बजाय संगठनात्मक अनुशासन, जिम्मेदारियों में फेरबदल या कुछ नेताओं को राजनीतिक रूप से साइडलाइन करने तक हो सकता है।

गौरतलब है कि कांग्रेस की पुरानी परंपरा रही है कि पार्टी के भीतर खुलकर विरोध करने वाले नेताओं को हर बार बाहर का रास्ता नहीं दिखाया जाता, बल्कि कई बार उन्हें संगठन में सीमित भूमिका देकर संतुलन बनाया जाता है। मनीष तिवारी जैसे नेताओं के साथ भी अलग-अलग समय में ऐसी राजनीतिक परिस्थितियां देखने को मिली हैं।

पंजाब की स्थिति कांग्रेस के लिए नई 

कर्नाटक समेत अन्य राज्यों में भी कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान सामने आती रही है, इसलिए पंजाब की स्थिति कांग्रेस के लिए नई है, लेकिन अभूतपूर्व नहीं। हालांकि पंजाब प्रभारी के खिलाफ सीधे नारे और पोस्टरबाजी ने विवाद को गंभीर जरूर बना दिया है।

इस समय सबसे बड़ा नुकसान यह है कि जिस समय कांग्रेस 2027 में आम आदमी पार्टी के खिलाफ वापसी की संभावनाएं तलाश रही थी, उस समय कांग्रेस के अपने नेता ही एक-दूसरे के खिलाफ खड़े दिखाई दे रहे हैं।

यदि यह टकराव जल्द नहीं थमा तो कार्यकर्ताओं में भ्रम, संगठन में कमजोरी और चुनावी रणनीति में बिखराव का सीधा असर कांग्रेस की चुनावी तैयारियों पर पड़ना तय है।

इसलिए आने वाले दिनों में राहुल गांधी और हाईकमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती पंजाब कांग्रेस में किसी एक नेता को मजबूत करना नहीं, बल्कि पंजाब कांग्रेस को टूटने से बचाना होगी। सवाल अब यह नहीं कि कांग्रेस में गुट हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हाईकमान इन गुटों को चुनाव से पहले एक मंच पर ला पाएगा।