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कैंडी-मैंगो समेत 16 हजार फ्लेवरों में छिपा 'जहर'; युवाओं के लिए बड़ा खतरा, PGI के विशेषज्ञों के दावे ने बढ़ाई चिंता

Published: Sun, 31 May 2026 07:10 AM (IST)

विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर पीजीआई चंडीगढ़ के विशेषज्ञों ने वेपिंग के खतरों का खुलासा किया है। इससे युवाओं में ...और पढ़ें

आकर्षक पैकेजिंग और हजारों फ्लेवरों के कारण वेपिंग का चलन युवाओं में तेजी से लोकप्रिय हो रहा।

आकर्षक पैकेजिंग और हजारों फ्लेवरों के कारण वेपिंग का चलन युवाओं में तेजी से लोकप्रिय हो रहा।

HighLights

  1. विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर विशेष पर रंगीन फ्लेवर के काले सच का खुलासा।

  2. वेपिंग का सेवन करने वालों में 30% में अस्थमा व 52% में स्ट्रोक का खतरा।

  3. इंटरनेट मीडिया से स्कूलों तक वेपिंग का जाल, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने जताई चिंता।

मोहित पांडेय, चंडीगढ़। मैंगो, बबलगम, चाॅकलेट और काटन कैंडी जैसे 16 हजार से अधिक आकर्षक फ्लेवरों के जरिए वेपिंग (ई-सिगरेट) युवाओं और किशारों को अपनी गिरफ्त में ले रही है। भारत में ई-सिगरेट पर कानूनी प्रतिबंध होने के बावजूद इनकी खेप आसानी से बाजार में पहुंच रही है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि वेपिंग केवल निकोटिन की लत ही नहीं बढ़ा रही, बल्कि अस्थमा, स्ट्रोक, अवसाद और फेफड़ों जैसी गंभीर बीमारियों का कारण भी बन रही है। 31 मई को मनाए जाने विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर पीजीआई के विशेषज्ञों ने यह खुलासा किया। 

सामुदायिक चिकित्सा विभाग के प्रोफेसर एवं तंबाकू नियंत्रण विशेषज्ञ डाॅ. सोनू गोयल के अनुसार इंटरनेट मीडिया के प्रभाव, आकर्षक पैकेजिंग और हजारों फ्लेवरों के कारण वेपिंग का चलन युवाओं में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

कई युवा इसे आधुनिक जीवनशैली और सुरक्षित विकल्प समझकर अपनाने लगे हैं, जबकि इसके स्वास्थ्य संबंधी खतरे लगातार सामने आ रहे हैं। डाॅ. गोयल ने बताया कि वेप्स या ई-सिगरेट बैटरी से संचालित ऐसे उपकरण हैं, जिनमें मौजूद निकोटिन युक्त तरल पदार्थ को गर्म करके एरोसोल बनाया जाता है।

इस एरोसोल में निकोटिन के अलावा भारी धातुएं, जहरीले रसायन और सूक्ष्म कण होते हैं, जो सीधे फेफड़ों तक पहुंचते हैं। उन्होंने कहा कि वेपिंग को अक्सर ‘सिर्फ पानी की भाप’ बताकर प्रचारित किया जाता है, जबकि वैज्ञानिक शोध इसकी वास्तविकता को पूरी तरह अलग साबित करते हैं।

सिर्फ फैशन नहीं, सेहत पर हमला

विशेषज्ञों के अनुसार बाजार में उपलब्ध 16 हजार से अधिक फ्लेवर युवाओं को आकर्षित करने के लिए तैयार किए गए हैं। मैंगो, मिंट, बबलगम, कोला और विभिन्न मिठाइयों से प्रेरित फ्लेवर निकोटिन की कड़वाहट को छिपा देते हैं, जिससे किशोर आसानी से इसकी ओर आकर्षित हो जाते हैं। यही कारण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने फ्लेवर आधारित वेपिंग उत्पादों को बच्चों और किशोरों में बढ़ती निकोटिन लत का प्रमुख कारण बताया है।

अध्ययन में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य

डाॅ. सोनू गोयल और उनकी टीम की ओर से किए गए एक अध्ययन में सामने आया कि वेपिंग करने वालों में अस्थमा का खतरा 30 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। इसके अलावा सीओपीडी, सांस संबंधी समस्याएं, उच्च रक्तचाप और फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी जैसी समस्याएं भी सामने आई हैं।

अध्ययन के अनुसार नियमित वेपिंग करने वालों में स्ट्रोक का खतरा 52 प्रतिशत तक अधिक पाया गया। निकोटिन किशोरावस्था में विकसित हो रहे मस्तिष्क को प्रभावित करता है।

इससे सीखने की क्षमता, ध्यान केंद्रित करने की शक्ति और निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि वेपिंग करने वाले किशोरों में अवसाद का खतरा 37 प्रतिशत और आत्मघाती विचारों की संभावना 23 प्रतिशत तक अधिक हो सकती है।

पेन, यूएसबी ड्राइव की तरह दिखाई दे रहे वेपिंग

विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक वेपिंग डिवाइस इतने छोटे और आकर्षक बनाए जाते हैं कि वे पेन, यूएसबी ड्राइव या अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरणों जैसे दिखाई देते हैं। ऐसे में अभिभावकों को बच्चों के व्यवहार में अचानक आए बदलावों पर नजर रखनी चाहिए। बार-बार प्यास लगना, गले में खराश, चिड़चिड़ापन, ध्यान की कमी, मूड स्विंग और कपड़ों से आने वाली मीठी गंध इसके शुरुआती संकेत हो सकते हैं।

प्रतिबंध के बावजूद बनी हुई चुनौती

भारत सरकार ने 2019 में ई-सिगरेट के निर्माण, बिक्री, आयात, भंडारण और विज्ञापन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बावजूद आनलाइन और अवैध माध्यमों से इनकी उपलब्धता चिंता का विषय बनी हुई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कानून के साथ-साथ जागरूकता अभियान चलाना भी जरूरी है, ताकि युवा इसके दुष्प्रभावों को समझ सकें।