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    विचार: दक्षिणी राज्यों ने किया अपना ही अहित

    By Dr. AK VermaEdited By: Manish Negi
    Updated: Fri, 24 Apr 2026 11:01 PM (GMT+05:30)

    क्या स्टालिन और विपक्षी दलों की चिंताएं जायज थीं? क्या वास्तव में 2011 के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन से दक्षिणी राज्यों का लोकसभा में प्रतिनिधित्व घटता ...और पढ़ें

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    HighLights

    1. 131वां संविधान संशोधन विधेयक विपक्ष के विरोध से अस्वीकृत हुआ।

    2. दक्षिणी राज्यों ने महिला आकांक्षाओं और अपने हितों को नुकसान पहुंचाया।

    3. बढ़े हुए लोकसभा सीटों से दक्षिणी राज्यों को लाभ होता।

    डा. एके वर्मा। विधायिका में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू करने, लोकसभा की सीटें बढ़ाने और 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करने का 131वां संविधान संशोधन विधेयक, 2026 विपक्षी दलों के विरोध के कारण अस्वीकृत हो गया। सत्तापक्ष के लिए यह संशोधन विधेयक दोनों हाथ में लड्डू जैसा था-पास हुआ तो सरकार को इसका क्रेडिट, नहीं पास हुआ तो विपक्ष दोषी। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने सदन में इसके पास होने की पूरा क्रेडिट विपक्ष को देने का प्रस्ताव किया, पर विपक्ष ने वह अवसर गंवा दिया।

    उन्हें लगा कि इससे प्रधानमंत्री तमिलनाडु और बंगाल चुनावों में महिलाओं का समर्थन लेना चाहते हैं। सबसे हास्यास्पद रुख तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन का रहा, जिन्होंने संविधान संशोधन की प्रति जलाई, काला झंडा फहराया, अपने सांसदों को लोकसभा में काले वस्त्र पहनाकर भेजा और घोषणा की कि ‘तमिलनाडु ने दिल्ली को हरा दिया।’ स्टालिन और विपक्षी दलों को पता नहीं कि उन्होंने दिल्ली को नहीं, वरन महिला आकांक्षाओं को हराया, जिसके प्रतिकूल राजनीतिक परिणाम होंगे।

    क्या स्टालिन और विपक्षी दलों की चिंताएं जायज थीं? क्या वास्तव में 2011 के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन से दक्षिणी राज्यों का लोकसभा में प्रतिनिधित्व घटता? और क्या नई जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन से इन राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा?

    तमिलनाडु, केरलम, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ने जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित की, प्रजनन दर न्यूनतम की (केरलम-1.7, तमिलनाडु-1.8, राष्ट्रीय-2.2) और जीडीपी में 30 प्रतिशत योगदान किया है, पर लोकतांत्रिक गणित और परिसीमन के संवैधानिक सिद्धांतों के कारण लोकसभा में उनकी सीटें घटने की पूरी संभावना है।

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    लोकतंत्र की मांग है कि सभी लोकसभा सांसद ‘लगभग समान’ जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करें। इसीलिए संविधान का अनुच्छेद 82 निर्देशित करता है कि प्रत्येक 10 वर्ष पर परिसीमन द्वारा इसे नियमित किया जाए। यदि इस संवैधानिक प्रविधान का पालन किया गया तो जिन राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर कम हुई है, वहां जनसंख्या कम होने से सीटें भी कम होंगी।

    2027 की जनगणना से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर 2028 में होने वाले परिसीमन से दक्षिणी राज्यों की सीटें तो घटेंगी ही। इस दृष्टिकोण से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन और दक्षिण के अन्य दलों ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी। अस्वीकृत संविधान संशोधन विधेयक में सभी राज्यों की लोकसभा सीटों में 50 प्रतिशत वृद्धि का प्रस्ताव किया गया था, जिससे न तो किसी दक्षिणी राज्य की लोकसभा सीट घटती, न ही लोकसभा में किसी राज्य के राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व का अनुपात घटता।

    यदि लोकसभा की 50 प्रतिशत सीटें बढ़ाए बिना 2011 की जनगणना के आधार पर राज्यों को लोकसभा की सीटें आवंटित होतीं तो तमिलनाडु की सीटें 39 से घट कर 32(-7), कर्नाटक की 28 से 27(-1), आंध्र की 25 से 22(-3), केरलम की 20 से 15(-5) और तेलंगाना की 17 से 16 (-1) हो जातीं। मोदी सरकार द्वारा प्रत्येक राज्य की लोकसभा सीटों में जो 50 प्रतिशत वृद्धि प्रस्तावित की गई थी, उससे तमिलनाडु को 59(+20), कर्नाटक को 42(+14), आंध्र को 38(+13), केरलम को 30(+10) और तेलंगाना को 26(+9) लोकसभा सीटें मिलतीं।

    इस तरह वे इस फार्मूले के तहत लाभ में रहते। गृहमंत्री अमित शाह ने विपक्ष की शंका दूर करने हेतु कहा था कि यदि सदन चाहे तो वे इस प्रविधान का समावेश कर एक घंटे के अंदर संशोधित विधेयक ला सकते हैं, लेकिन विपक्ष ने विरोध के जुनून में यह सुअवसर खो दिया। इस तरह विपक्षी दलों ने अपना और दक्षिणी राज्यों का दोहरा नुकसान किया। महिलाओं की आकांक्षाओं को जो आघात पहुंचाया, सो अलग।

    विपक्ष अब कह रहा है कि 543 सीटों पर महिला आरक्षण लागू कर दीजिए। हम सर्वसम्मति से पास कर देंगे, लेकिन शायद उसे ज्ञात नहीं कि इसका परिणाम क्या होगा? यदि वर्तमान संख्या पर ही इसे लागू किया गया तो लोकसभा की 180 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी और पुरुषों के लिए केवल 363 सीटें ही बचेंगी। अर्थात 180 पुरुष सांसद-चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों, लोकसभा सीट से बेदखल हो जाएंगे।

    परिणामस्वरूप प्रत्येक वंचित सांसद चाहेगा कि उसकी सीट उसी के परिवार के पास रहे और उसी के घर की किसी महिला को चुनाव लड़ने का अवसर मिले, जिससे क्षेत्र पर उसकी पकड़ बनी रहे। इससे आम महिलाओं को राजनीतिक क्षेत्र में हिस्सेदारी देने का संकल्प एक मजाक बन कर रह जाता। जो दल अपने सांसदों के परिवार की महिलाओं को लोकसभा चुनाव में उतारने के लिए सहमत नहीं होता, उसे विद्रोह और विखंडन का सामना करना पड़ता।

    यह एक गंभीर मुद्दा है कि दक्षिणी राज्यों की विकास दर बेहतर होने और उनके द्वारा राष्ट्रीय जनसंख्या नीति को सफलता से लागू करने के बावजूद लोकतांत्रिक सिद्धांत के कारण लोकसभा में उनका स्थान क्यों घटना चाहिए, लेकिन यह भी चिंता का विषय है कि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव संसद में सर्वप्रथम 1996 में प्रस्तावित हुआ था और आज 30 वर्ष बाद भी महिलाएं उसे प्राप्त करने की प्रतीक्षा क्यों कर रही हैं? अब गेंद संसद के हाथ से निकाल कर परिसीमन आयोग के पाले में चली गई है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय का एक न्यायाधीश, मुख्य-चुनाव आयुक्त और निर्वाचन-आयोग का सचिव होता है।

    ध्यान रहे परिसीमन आयोग के निर्णयों को सर्वोच्च न्यायालय में भी चुनौती नहीं दी जा सकती। क्या यह संभव नहीं था कि विपक्षी राजनीतिक दल महिला आरक्षण पर सकारात्मक निर्णय लेकर 30 वर्षों की प्रतीक्षा पर विराम लगाते और ‘लैंगिक समावेशन’ से इसे लोकतांत्रिक परिवर्तन का ऐतिहासिक क्षण बनाते? विपक्ष के जो भी संशय रहे हों, लेकिन फिलहाल उसने महिलाओं के लोकसभा और विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व, उत्तरदायित्व निर्वहन और नीति-निर्णयन में प्रस्तावित त्वरित सहभागिता पर कुछ वर्षों के लिए विराम लगा दिया है।

    (लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं सेंटर फार द स्टडी आफ सोसायटी एंड पालिटिक्स के निदेशक हैं)