देसी दिमाग का दबदबा: भारतीय प्रतिभा के लिए 'स्वर्णिम युग'
आज वैश्विक मंच पर भारतीय दिमागों का दबदबा बढ़ रहा है, जो प्रौद्योगिकी, मनोरंजन और वित्त जैसे क्षेत्रों में शीर्ष पदों पर हैं। नेटफ्लिक्स, यूट्यूब, गूग ...और पढ़ें

विदेशियों कंपनियों में भारतीयों का दबदबा (प्रतीकात्मक फोटो)
आरती तिवारी। आज के दौर में अगर आप नेटफ्लिक्स पर कोई वेब सीरीज देख रहे हैं, यूट्यूब पर कोई वीडियो स्क्राल कर रहे हैं या अमेरिका में एआइ की भविष्य की नीतियों की चर्चा सुन रहे हैं, तो एक बात तय है- इन सबके पीछे कोई न कोई भारतीय दिमाग ‘बास’ की कुर्सी पर है। मनोरंजन की चकाचौंध से लेकर सिलिकान वैली के जटिल एल्गोरिदम तक, फैसलों की कमान अब अधिकांशत: प्रवासी भारतीयों-भारतवंशियों के हाथ में है। पहले जहां सुंदर पिचई, सत्या नडेला जैसे गिने-चुने लोग दिग्गज विदेशी कंपनियों की चाल संभाल रहे थे, आज इनमें प्रवासी भारतीयों-भारतवंशियों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि अंगुलियां कम पड़ जाएंगी! भारतीय मूल ही भविष्य की वैश्विक मुद्रा यह 76 गणतंत्र दिवस देख चुके उस भारत की कहानी है , जो आत्मविश्वास से भरा है। चाहे ओटीटी के जरिए मनोरंजन की परिभाषा बदलनी हो या एआइ के जरिए मानवता का भविष्य सुरक्षित करना हो, भारतीय प्रतिभा आज दुनिया के सबसे बड़े मंचों पर सबसे ऊंची कुर्सी पर विराजमान है। भारतीय मूल्य, संयम और बुद्धिमत्ता ही अब भविष्य की वैश्विक मुद्रा हैं। नए भारत की यह धमक सीमाओं के पार, सात समंदर पार के बोर्डरूम्स में गूंज रही है। यह ‘स्वर्णिम युग’ की दस्तक है, जहां दुनिया पर असर डालने वाले फैसलों की कमान हिंदुस्तानियों के पास है।
हमसे है जमाना सारा
गूगल, माइक्रोसाफ्ट, एडोब, आइबीएम और यूट्यूब आदि के शीर्ष पर भारतीय नेतृत्व का होना महज इत्तेफाक नहीं। वे न केवल तकनीकी रूप से सक्षम हैं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक समझ और ‘इमोशनल इंटेलिजेंस’ के साथ वैश्विक बाजार को नई दिशा दे रहे हैं। चाहे वह वाइट हाउस हो या नेटफ्लिक्स का बोर्डरूम, आज बिना हिंदुस्तानियों के वैश्विक भविष्य की कल्पना करना कठिन है। अमेरिकी विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीयों की ‘इमोशनल इंटेलिजेंस’ और ‘मैनेजमेंट स्टाइल’ दूसरों से अलग है। भारतीय लीडर्स मानवीय मूल्यों और वैश्विक बाजार की नब्ज को पहचानते हैं और ‘कमांड एंड कंट्रोल’ के बजाय ‘सहयोग और सहानुभूति’ पर भरोसा करते हैं। भारतीय मेधा की यह खूबी—कि वे विपरीत परिस्थितियों में भी शांत रहकर जुगाड़ निकाल लेते हैं—उन्हें वैश्विक बोर्डरूम की पहली पसंद बनाती है।
एल्गोरिदम की पकड़ी नब्ज
लगभग एक दशक पहले तक हालीवुड और वैश्विक मनोरंजन बाजार में भारतीयों की भूमिका अभिनय या तकनीकी सहयोग तक सीमित थी, लेकिन आज नजारा बदल चुका है। अब भारतीय मस्तिष्क तय कर रहे हैं कि दुनिया के करोड़ों दर्शक अपने मोबाइल और टीवी स्क्रीन पर क्या देखेंगे। इस सूची में सबसे ऊपर नाम आता है बेला बजारिया का। नेटफ्लिक्स की चीफ कंटेंट आफिसर के तौर पर बेला ने पहले ही अपना लोहा मनवाया था, लेकिन अब उनके कंधों पर वार्नर ब्रोज जैसी दिग्गज कंपनी की हेडशिप की जिम्मेदारी भी आ गई है। वे आज वैश्विक सिनेमा और डिजिटल स्पेस के सबसे शक्तिशाली नामों में से एक हैं। इसी तरह बिंज वाचिंग के अलावा एल्गोरिदम को बखूबी समझकर यूट्यूब के शार्ट्स और प्रीमियम माडल को सफल बनाने का श्रेय जाता है नील मोहन को। दुनिया के सबसे बड़े वीडियो प्लेटफार्म यूट्यूब के सीईओ नील मोहन आज डिजिटल एंटरटेनमेंट मीडिया की दिशा तय कर रहे हैं। करोड़ों क्रिएटर्स की कमाई और दर्शकों की पसंद उनके एक फैसले से प्रभावित होती है। तकनीक की पूरी समझ भविष्य की तकनीक पर भी भारतीय प्रतिभा की पकड़ है। ‘टाइम’ मैगजीन के ‘पर्सन आफ द ईयर’ कवर से लेकर व्हाइट हाउस की मीटिंग्स तक भारतीय चेहरे हर तरफ छाए हुए हैं। प्रतिष्ठित ‘टाइम’ मैगजीन के कवर पेज पर अपनी जगह बनाने वाले करनदीप आनंद की कहानी पूरी फिल्मी है। किसी रोबोट से भावनात्मक संवाद करना फिल्मी ही लगता है, मगर करनदीप ने कैरेक्टरडाटएआइ के रूप में संवाद करने वाली मशीनों को ‘व्यक्तित्व’ दिया।
कैरेक्टरडाटएआइ के सीईओ करनदीप फेसबुक और मेटा में बड़े पदों पर रहने के बाद अब एआइ के जरिए इंसानी बातचीत के तरीके को बदल रहे हैं। इतना ही नहीं, संयुक्त राज्य अमेरिका की वह इमारत, जहां दुनिया को प्रभावित करने वाले फैसले लिए जाते हों, उस वाइट हाउस में एआइ सलाहकार भारतीय मूल के श्रीराम कृष्णन हैं। तकनीकी विशेषज्ञ और सफल वेंचर कैपिटलिस्ट के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले श्रीराम कृष्णन अब अमेरिकी राजनीति और नीति-निर्धारण के केंद्र में हैं। श्रीराम कृष्णन ट्विटर (अब एक्स) के पूर्व कार्यकारी रह चुके हैं और तकनीक की दुनिया की रग-रग से वाकिफ हैं।
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विदेशी तिजोरी के देसी प्रबंधक
भारत की सख्त शिक्षा प्रणाली और जटिल बाजार के अनुभव की विदेश में भी तूती बोलती है। यूनीलिवर, लेवाइज और टेस्ला जैसी एक दर्जन से ज्यादा बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों में मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) भारतीय चेहरे ही हैं। पंजाब विश्वविद्यालय की छात्रा रहीं पाम कौर एचएसबीसी की पहली महिला ग्रुप सीएफओ बनकर इतिहास रच चुकी हैं तो वहीं टेस्ला के सीएफओ भारतीय मूल के वैभव तनेजा हैं, जिन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है और एलन मस्क की टीम के बेहद अहम सदस्य हैं। इसी तरह लेवाइज कंपनी के सीएफओ हरमीत सिंह, यूनीलिवर कंपनी में श्रीनिवास फाटक, पेमेंट साल्यूशन कंपनी मास्टरकार्ड के सीएफओ सचिन मेहरा, एप्पल कंपनी में सीएफओ केवन पारेख इन विदेशी कंपनियों के रणनीतिक फैसले लेने वाले प्रमुख लोग हैं!