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    विचार: दहेज का मकड़जाल तोड़ने की चुनौती

    By Dr. Ritu SaraswatEdited By: Manish Negi
    Updated: Fri, 24 Apr 2026 11:43 PM (IST)

    शीर्ष न्यायालय ने टिप्पणी देते हुए कहा, 'महिलाओं के प्रति एक व्यवस्थित पूर्वाग्रह है, जो समाज के सभी वर्गों में व्याप्त है और उन्हें कम आंकता है। ...और पढ़ें

    दहेज का मकड़जाल तोड़ने की चुनौती (प्रतीकात्मक तस्वीर)

    दहेज का मकड़जाल तोड़ने की चुनौती (प्रतीकात्मक तस्वीर)

    डा. ऋतु सारस्वत। हाल में देश की शीर्ष अदालत ने 'मुन्नी देवी बनाम बिहार राज्य एवं अन्य' के मामले में पटना उच्च न्यायालय के उस आदेश पर कड़ी आपत्ति व्यक्त की, जिसमें दहेज हत्या जैसे गंभीर अपराध में आरोपी को जमानत प्रदान कर दी गई थी। शीर्ष अदालत ने कहा, ' जानलेवा घटनाओं में जहां तथ्य स्पष्ट रूप से आरोपित की सीधी संलिप्तता दिखाते हैं, वहां दहेज हत्या के मामलों में जमानत देते समय अदालतों को बहुत सावधानी बरतनी चाहिए।'

    यह कोई पहला मामला नहीं है। बीते दशकों में सर्वोच्च न्यायालय से लेकर विभिन्न उच्च न्यायालय बार-बार दहेज हत्याओं पर गंभीर चिंता व्यक्त कर चुके हैं। विडंबना यह है कि कथित आधुनिक समाज में भी यह कुप्रथा केवल जीवित ही नहीं है, बल्कि जारी है। एनसीआरबी की नवीनतम रिपोर्ट 'क्राइम इन इंडिया-2023' के अनुसार 2023 में 6,156 दहेज मृत्यु के मामले दर्ज किए गए। यानी औसतन हर दिन लगभग 17 महिलाओं की जान दहेज की बलि चढ़ रही है। ये केवल वही आंकड़े हैं, जो दर्ज किए गए। वास्तविकता इससे कहीं अधिक गंभीर हो सकती है। सामाजिक दबाव, पारिवारिक प्रतिष्ठा और आर्थिक प्रभाव के चलते अनेक ऐसी घटनाएं हैं, जो कभी सामने ही नहीं आ पातीं।

    यह एक गहन विश्लेषण का विषय है कि दहेज हत्याएं आखिर क्यों जारी हैं? यह केवल आपराधिक कृत्य नहीं, बल्कि समाज की संरचना, मानसिकता और कमजोरियों का प्रतिबिंब है। इसी संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का दिसंबर 2025 का निर्णय (उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अजमल बेग) उल्लेखनीय है। यह मामला एक 20 वर्षीय युवती के साथ हुए जघन्य अपराध से संबंधित था। उसके जीवन का अंत केवल इसलिए हो गया, क्योंकि उसके माता-पिता विवाह के माध्यम से उसके ससुराल पक्ष की इच्छाओं और लालच को पूरा करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं जुटा सके।

    शीर्ष न्यायालय ने टिप्पणी देते हुए कहा, 'महिलाओं के प्रति एक व्यवस्थित पूर्वाग्रह है, जो समाज के सभी वर्गों में व्याप्त है और उन्हें कम आंकता है। महिला द्वारा वैवाहिक घर में लाया गया दहेज सीधे दूल्हे के मूल्य से संबंधित होता है, जिसे महिला, स्वयं की तरह दहेज के बिना पूरा करने में असमर्थ मानी जाती है या अयोग्य समझी जाती है।'

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    आधुनिकता के तमाम दावों के बावजूद समाज में दहेज का ऐसा मकड़जाल बना हुआ है, जो एक प्रकार के सामूहिक भ्रम की तरह कार्य करता है। सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचे में अमूमन लड़कियों का स्थान पुरुषों की तुलना में कमतर निर्धारित किया गया है। संभवतः यही कारण है कि उन्हें पुरुषों के समतुल्य स्थापित करने के लिए दहेज जैसी कुप्रथा को आज भी आवश्यक मान लिया जाता है। दहेज की संस्कृति ग्रामीण अंचलों से लेकर कारपोरेट वातावरण तक समान रूप से विद्यमान है। यह अपेक्षा की जाती है कि शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वतंत्र युवा पीढ़ी इस कुप्रथा का खुलकर विरोध करेगी, किंतु व्यवहार में ऐसा दिखाई नहीं देता। परंपरागत सोच का प्रभाव आज भी इतना गहरा है कि आधुनिकता के दावों के बीच भी यह प्रथा बनी हुई है।

    प्रश्न यह उठता है कि किन परिस्थितियों में बेटियों का विवाह ऐसे परिवारों में कर दिया जाता है, जहां लालच स्पष्ट रूप से विद्यमान होता है। क्या यह मजबूरी है या सामाजिक दबाव के कारण कि ऐसे संकेतों को अनदेखा कर दिया जाता है? वास्तव में लालच छिपा नहीं होता, वह व्यवहार, अपेक्षाओं और बातचीत के स्वर में प्रारंभिक स्तर पर ही स्पष्ट हो जाता है, परंतु प्रायः उसे अनदेखा कर दिया जाता है, जो आगे चलकर गंभीर सामाजिक त्रासदी का रूप ले लेता है। यही संकेत अक्सर सधे हुए और सभ्य दिखने वाले वाक्यों में छिपे होते हैं-जैसे 'हमें कुछ नहीं चाहिए, जो देंगे अपनी बेटी को देंगे', 'हम कोई मांग नहीं रखते, बस अपनी खुशी से जो उचित समझें।'

    ये शब्द जितने विनम्र प्रतीत होते हैं, उतने ही गहरे अर्थ अपने भीतर छिपाए होते हैं। यही वह बिंदु है जहां स्पष्ट अन्याय भी शिष्टाचार का रूप धारण कर लेता है और लालच को सामाजिक स्वीकृति मिल जाती है। अंततः प्रश्न केवल कानून का नहीं, बल्कि समाज की चेतना का है। जब तक दहेज को सम्मान, परंपरा या 'अपनी खुशी' के नाम पर स्वीकार किया जाता रहेगा, तब तक बेटियों के सम्मान और अधिकारों के साथ समझौता होता रहेगा और न्याय केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा।

    समस्या केवल प्रथा की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की है, जो विवाह को सर्वोपरि मानकर हर अन्याय को स्वीकार्य बना देती है। परिवर्तन की पहली शर्त यह है कि विवाह को किसी स्त्री के जीवन का अंतिम लक्ष्य मानने की धारणा से आगे बढ़ा जाए। यह उसके जीवन का एक संभावित अध्याय मात्र है, जबकि उसकी वास्तविक सुरक्षा उसकी स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और आर्थिक स्वायत्तता में निहित है।

    जब यह समझ विकसित होती है, तब स्त्री केवल संबंधों को निभाने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें परखने और आवश्यकता पड़ने पर अस्वीकार करने की स्थिति में भी होती है। यही वह बिंदु है जहां दहेज जैसी प्रथाएं अपनी पकड़ खोने लगती हैं, क्योंकि उनका आधार ही इस भय पर टिका होता है कि विवाह किसी भी कीमत पर बनाए रखना है। जब यह भय समाप्त होता है तो समझौते की बाध्यता भी स्वतः समाप्त हो जाती है और सम्मान को प्राथमिकता मिलने लगती है।

    (लेखिका समाजशास्त्र की प्रोफेसर हैं)