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    108 कलशों के जल से हुआ महाप्रभु का स्नान, भक्तों को खुले मंच से दर्शन देंगे भगवान जगन्नाथ

    Updated: Mon, 29 Jun 2026 09:31 AM (IST)

    पुरी में देव स्नान पूर्णिमा श्रद्धा और वैदिक विधि-विधान से मनाई गई, जहाँ भगवान जगन्नाथ और अन्य विग्रहों का 108 पवित्र कलशों के जल से महाअभिषेक किया गय ...और पढ़ें

    HighLights

    1. 108 पवित्र कलशों से महाप्रभु का महाअभिषेक संपन्न।

    2. खुले मंच पर भक्तों को भगवान जगन्नाथ के दर्शन।

    3. दुर्लभ हाती बेश के बाद 15 दिन अनासार में विश्राम।

    संवाद सहयोगी, पुरी। आस्था, परंपरा और सनातन संस्कृति के सबसे भव्य आयोजनों में शामिल देव स्नान पूर्णिमा सोमवार को श्रीजगन्नाथ धाम पुरी में श्रद्धा और वैदिक विधि-विधान के साथ मनाई जाएगी। 

    इस पावन अवसर पर भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र, बहन देवी सुभद्रा, सुदर्शन और मदनमोहन को गर्भगृह से बाहर स्नान मंडप पर लाकर 108 पवित्र कलशों के जल से महाअभिषेक किया जाएगा। इसी अनुष्ठान के साथ विश्वविख्यात रथयात्रा महापर्व का औपचारिक शुभारंभ माना जाता है।

    खुले मंच पर प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं महाप्रभु 

    स्नान पूर्णिमा वर्ष का एकमात्र ऐसा अवसर होता है, जब महाप्रभु अपने भक्तों को खुले मंच पर प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। तड़के मंगला आरती, अबकाश और अन्य दैनिक नीतियों के बाद चारों विग्रहों को पारंपरिक पहंडी विजय के माध्यम से रत्न सिंहासन से स्नान मंडप तक लाया जाएगा। 

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    मंदिर परिसर स्थित पवित्र सुना कुआं (स्वर्ण कूप) से निकाले गए जल को चंदन, कपूर, अगरु, केसर, पुष्प और औषधीय जड़ी-बूटियों से सुगंधित कर 108 स्वर्ण कलशों में भरा जाता है। इन्हीं कलशों से भगवान का राजकीय स्नान कराया जाता है।

    भगवान जगन्नाथ को 35 कलशों के जल से स्नान

    परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ को 35, भगवान बलभद्र को 33, देवी सुभद्रा को 22 और सुदर्शन को 18 कलशों के जल से स्नान कराया जाता है। वैदिक मंत्रोच्चार, शंखध्वनि और घंटानाद के बीच संपन्न होने वाला यह अनुष्ठान श्रीजगन्नाथ संस्कृति की सबसे भव्य धार्मिक परंपराओं में से एक माना जाता है।

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    महाअभिषेक के बाद गजपति महाराजा परंपरागत छेरा पहंरा की रस्म निभाएंगे। इसके उपरांत भगवान जगन्नाथ और बलभद्र को दुर्लभ हाती बेश (गजानन वेश) में सजाया जाएगा। मान्यता है कि भगवान ने अपने परम भक्त गणपति भट्ट को दर्शन देने के लिए गणेश स्वरूप धारण किया था। तभी से स्नान पूर्णिमा पर हाती बेश की परंपरा चली आ रही है। इस दिव्य स्वरूप के दर्शन के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं।

    15 दिनों तक नहीं होंगे महाप्रभु के दर्शन

    धार्मिक मान्यता के अनुसार 108 कलशों के शीतल जल से स्नान के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके बाद उन्हें अनासार गृह में 15 दिनों तक विश्राम कराया जाता है। इस दौरान आम श्रद्धालुओं के लिए प्रत्यक्ष दर्शन बंद रहते हैं। 

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    केवल दैतापति सेवक विशेष आयुर्वेदिक औषधियों से भगवान की सेवा करते हैं। अनासार अवधि पूरी होने के बाद नवयौवन दर्शन होता है और फिर भगवान भव्य रथयात्रा के लिए अपने रथों पर विराजमान होकर भक्तों के बीच आते हैं।

    राजा इंद्रद्युम्न से जुड़ी है परंपरा

    स्कंद पुराण के अनुसार श्रीजगन्नाथ मंदिर में विग्रहों की स्थापना के बाद राजा इंद्रद्युम्न ने पहली बार देव स्नान का आयोजन कराया था। तभी से ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन यह परंपरा अनवरत चली आ रही है। इसे भगवान जगन्नाथ के प्राकट्य दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।

    स्नान पूर्णिमा एक नजर में

    • 108 पवित्र कलशों से महाप्रभु का महाअभिषेक।
    • वर्ष में केवल एक बार सार्वजनिक दर्शन।
    • दुर्लभ हाती बेश में भगवान के दर्शन।
    • स्नान के बाद 15 दिनों तक अनासार गृह में विश्राम।
    • अनासार के बाद नवयौवन दर्शन और फिर विश्वविख्यात रथयात्रा।

    गौरतलब है कि जगन्नाथ संस्कृति में देव स्नान पूर्णिमा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भगवान और भक्त के बीच प्रत्यक्ष मिलन का ऐसा आध्यात्मिक पर्व है, जिसके साथ रथयात्रा की दिव्य परंपरा का शुभारंभ होता है। यह दिन सनातन आस्था, ओडिशा की सांस्कृतिक विरासत और श्रीजगन्नाथ परंपरा की विश्वव्यापी पहचान का प्रतीक माना जाता है।