चीन का 'ग्रे-जोन' गेम: भारत को हथियारबंद सह-अस्तित्व के लिए क्यों तैयार रहना चाहिए?
पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले का तर्क है कि चीन रणनीतिक अवसर का इंतजार कर 'ग्रे-जोन' सैन्य दबाव बनाता है, ...और पढ़ें

भारत को हथियारबंद सह-अस्तित्व के लिए क्यों तैयार रहना चाहिए। (यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है)
HighLights
चीन रणनीतिक अवसर पर 'ग्रे-जोन' सैन्य दबाव बनाता है।
भारत-चीन संबंध 'सशस्त्र सह-अस्तित्व' के युग में प्रवेश कर रहे।
चीन का मकसद भारत को दक्षिण एशिया तक सीमित रखना है।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले का तर्क है कि चीन रणनीतिक रूप से अवसर की प्रतीक्षा करता है, पूर्व-नियोजित कार्रवाई करता है और फिर आत्मरक्षा की कहानी गढ़ता है।
उनकी नई किताब, 'चीन के युद्ध: उसके सैन्य दबाव के पीछे की राजनीति और कूटनीति' अतीत का संघर्षों और चीन की हालिया अस्पष्ट रणनीति का विश्लेषण करती है।
TOI के साथ बातचीत में गोखले ने बताया कि भारत चीन संबंध 'सशस्त्र सह-अस्तित्व' के युग में क्यों प्रवेश कर चुके हैं। एक पूर्ण पैमाने पर युद्ध सबसे संभावित परिणामों में से क्यों नहीं है, लेकिन इसे नकारा भी नहीं जा सकता। शी चिनफिंग के बाद राजनीतिक अनिश्चितता, वैश्विक आर्थिक झटके या सैन्य दुस्साहस को कैसे जन्म दे सकती है?
विजय गोखले कहा कि चीन एक मौकापरस्त देश है, जो सीधे युद्ध के बजाय रणनीतिक मौकों का इंतजार कर 'ग्रे-जोन' सैन्य दबाव बनाने की नीति अपनाता है।
चीन की प्रिवेंटिव डेटेरेंस की सोच पश्चिमी सोच से अलग
पूर्व विदेश सचिव ने बताया कि चीन की प्रिवेंटिव डेटेरेंस की सोच पश्चिमी सोच से अलग है। पश्चिम में डेटरेंस एक ऐसी जवाबी कार्रवाई है जिसका मकसद दुश्मन को आगे बढ़ने या तनाव बढ़ाने से रोकने के लिए होता है।
चीन के मामले में यह प्री-एम्प्टिव होता है, यानी चीन दुश्मन के पहला कदम उठाने से पहले ही कार्रवाई कर देता है। इसका मकसद दुश्मन को राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक झटका देना होता है, ताकि वह पीछे हट जाए और जवाबी कार्रवाई से डरे।
उन्हेंने कहा कि 1962 का युद्ध इसका एक उदाहरण है। ऐसा संकेत नहीं था कि भारत कोई सैन्य हमला करने वाला था, लेकिन चीन ने भारत के खिलाफ पहले से ही कार्रवाई करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बयानों और क्यूबा मिलाइल संकट के समय बने अंतरराष्ट्रीय हालात का फायदा उठाया।
चीन का मकसद भारत को दक्षिण एशिया तक सीमित रखना
विजय गोखले कहते हैं कि चीन का मुख्य मकसद भारत को दक्षिण एशिया तक ही सीमित रखना। क्योंकि इस सदी में अमेरिका के अलावा उसके कुछ ही संभावित प्रतिद्वंदी है और भारत उनमें से एक उनमें से एक है।
अगर आप भारत की भौगोलिक स्थिति, आबादी क्षेत्रफल, प्रतिभा और आर्थिक क्षमता को देखें, तो ये सभी बातें इस बात को पुख्ता करती हैं कि भारत इस सदी में एक बड़ी ताकत बन सकता है। और जाहिर है, चीन इस संभावना में देरी करना चाहेगा।
भारत और चीन के बीच बड़े पैमाने पर युद्ध की संभावना पर क्या बोले गोखले?
निकट भविष्य में भारत और चीन के बीच बड़े पैमाने पर युद्ध की संभावना पर पूर्व विदेश सचिव कहते हैं कि इस बारे में कोई पक्के तौर पर कुछ नहीं कह सकता। चीन और उसके फैसले लेने की प्रक्रिया अपारदर्शी है, और वहां स्वतंत्र मीडिया या नागरिक समाज जैसे जानकारी के वैकल्पिक स्रोत नहीं हैं।
चीन एक परिपक्व देश है जो दुनिया की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था और ताकत बनने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। तर्कसंगत लागत-लाभ विश्लेषण के आधार पर, भारत के साथ बड़े युद्ध की कीमत उससे मिलने वाले फायदों से कहीं ज्यादा हो सकती है। तार्किक रूप से, चीन ऐसे संघर्ष में शामिल होने से हिचकिचाएगा।
हालांकि, भविष्यवाणी करना असंभव है। हमें सबसे खराब स्थिति के लिए तैयार रहना होगा, साथ ही यह भी समझना होगा कि निकट भविष्य में भारत के साथ सीधा संघर्ष चीन के हित में नहीं हो सकता है। ताइवान के खिलाफ चीन की क्षमताएं बढ़ी हैं, जबकि अमेरिका कई संघर्षों में उलझा हुआ है।
