विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

आप कॉरपोरेट दबाव के आगे झुक रहे, क्या आप नहीं चाहते कि लोग स्वस्थ रहें; सुप्रीम कोर्ट की FSSAI को कड़ी फटकार

Published: Fri, 14 Aug 2026 06:50 AM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने पैक्ड फूड के डिब्बे पर चीनी, नमक, सैचुरेटेड फैट की अधिकता का लेबल लगाने को लेकर खाद्य ...और पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट की FSSAI को कड़ी फटकार (फोटो- AI Generated)

सुप्रीम कोर्ट की FSSAI को कड़ी फटकार (फोटो- AI Generated)

HighLights

  1. ज्यादा चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट वाले उत्पाद के पैकेट पर लेबल की मांग पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

  2. पैकेट पर चेतावनी लेबल लगाने के बारे में एफएसएसएआई की अनिच्छा पर शीर्ष अदालत ने जताई नाराजगी

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने पैक्ड फूड के डिब्बे पर चीनी, नमक, सैचुरेटेड फैट की अधिकता का लेबल लगाने को लेकर खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की हिचकिचाहट पर सवाल उठाते हुए कहा-आप कॉरपोरेट दबाव के आगे झुक रहे हैं। क्या आप नहीं चाहते कि देश के लोग स्वस्थ रहें।

कोर्ट ने एफएसएसएआई की एक बैठक के मिनट पर गौर किया, जिसमें इन उपायों को लागू करने में उसकी अनिच्छा दिख रही है। कोर्ट एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें एफएसएसएआई को इस तरह का उपाय लागू करने का निर्देश देने का आग्रह किया गया है।

पिछली सुनवाइयों में कोर्ट ने एफएसएसएआई से जनस्वास्थ्य के हित में पैक्ड फूड के डिब्बों पर सामने इस तरह की चेतावनी लेबल लगाने पर विचार करने को कहा था।

मामले पर गुरुवार को न्यायमूर्ति जेबी पार्डीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष हुई सुनवाई में याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि उसने एफएसएसएआई की मीटिंग के मिनट देखे हैं। उसमें बिल्कुल उलट फैसला किया गया है।

इस पर पीठ ने एफएसएसएआई की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ब्रजेंद्र चाहर से कहा कि क्या आप ऐसा नहीं करना चाहते। क्या इन सभी कारपोरेट घरानों की तरफ से आप पर बहुत दबाव है और आप उसके आगे झुक रहे हैं।

आपको छोटे बच्चों के स्वास्थ्य के बारे में चिंतित होना चाहिए, जो इन चीजों के आदी हो रहे हैंः सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान एफएसएसएआई की ओर से पेश एएसजी ने कहा कि भारत में ऐसा उपाय आदर्श नहीं हो सकता क्योंकि भारतीय भोजन में अन्य देशों के साधारण भोजन की तुलना में नमक, वसा और चीनी की मात्रा ज्यादा होती है।

मुश्किल यह है कि हमारे हर एक भोजन पर लाल निशान लगा होगा। चाहे वह नमकीन हो या कुछ और। उस पर चेतावनी लिखी होगी कि यह बहुत हानिकारक है। विकसित देशों में भोजन सादा होता है। उसमें चीनी और वसा कम होती है, ये मानक भारतीय पारंपरिक भोजन पर लागू नहीं होंगे।

कोर्ट ने कहा कि लाल लेबल न होने पर भी सबको पता है कि इसमें चीनी, वसा और कार्बोहाइड्रेट आदि है। आपको छोटे बच्चों के स्वास्थ्य के बारे में चिंतित होना चाहिए, जो इन चीजों के आदी हो रहे हैं। कोर्ट ने विशेष रूप से सवाल उठाया कि एफएसएसएआई इस तरह के उपाय लागू करने में क्यों हिचकिचा रहा है। निर्माताओं को यह पसंद नहीं आ सकता, क्योंकि इससे उनके व्यवसाय पर असर पड़ सकता है।

इन चेतावनियों के बाद भी, इसे खरीदने वाले व्यक्ति का अपना विवेक है। वह इसे खरीद भी सकता है और नहीं भी खरीद सकता है। आप (एफएसएसएआई) ऐसा करने में आनाकानी क्यों कर रहे हैं।

एएसजी ने कहा कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम के राजस्व का एक तिहाई हिस्सा पारंपरिक खाद्य पदार्थों से आता है। ये सभी प्रभावित होंगे।

अगली बार फैसला हम करेंगे

अदालत ने कहा कि हम यह जनहित में कर रहे हैं। हम आप पर पड़ रहे दबावों को जानते है। कोर्ट इस स्पष्टीकरण से भी प्रभावित नहीं हुआ कि अगर इस तरह के चेतावनी लेबल लागू किए जाते हैं, तो नमकीन जैसे कई भारतीय खाद्य पदार्थों को भी वसा, चीनी और नमक की उच्च मात्रा वाले के रूप में लेबल किया जाएगा।

इस पर कोर्ट ने कहा कि वह किसी खास खाद्य पदार्थ के खिलाफ नहीं है, सिर्फ इतना चाहते हैं कि इसे खरीदने वाले व्यक्ति को पता हो कि वह क्या खा रहा है। कोर्ट ने केंद्र और एफएसएसएआइ को अपना अंतिम निर्णय दर्ज कराने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। कोर्ट ने कहा कि अगली बार फैसला हम करेंगे।