पुलिस कस्टडी में दिए बयान के आधार पर नहीं लग सकता NSA : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा मामले में मुल्ला अफरोज की हिरासत को रद कर दी है। कोर्ट ने कहा है ...और पढ़ें

संभल हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला। (फाइल फोटो।)
HighLights
तकनीकी आधार पर खारिज किया संभल हिंसा के आरोपित मुल्ला अफरोज के विरुद्ध एनएसए
यूपी सरकार पर 10 लाख का जुर्माना भी लगाया।
फिलहाल जेल से बाहर नहीं आ पाएगा मुल्ला अफरोज।
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में हुई संभल हिंसा के आरोपी मुल्ला अफरोज को रासुका (एनएसए) में बंद रखे जाने को गैरकानूनी ठहराते हुए निरुद्ध आदेश रद कर दिया है। मुख्य रूप से तकनीकी आधार पर राज्य सरकार के फैसले को नकारा गया है क्योंकि सिर्फ पुलिस कस्टडी में दिए गए बयान के आधार पर किसी को प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) में नहीं रखा जा सकता।
जाहिर तौर पर यह राज्य पुलिस का लापरवाही ही मानी जाएगी क्योंकि उसे इसका पता होना ही चाहिए था। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि आपराधिक रिकॉर्ड वाला अफरोज इस राहत के बावजूद फिलहाल जेल से बाहर नही आ पाएगा क्योंकि तकरीबन एक दर्जन अन्य मामला लंबित हैं। इतना ही नहीं कोर्ट ने प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है जिसका भुगतान एक महीने के भीतर अपीलकर्ता को किया जाएगा।
फिर भी जेल से बाहर नहीं आ पाएगा मुल्ला अफरोज
सुप्रीम कोर्ट से रासुका रद होने के बावजूद मुल्ला अफरोज अन्य मामलों में आरोपित होने के कारण जेल से बाहर नहीं आ पाएगा। हालांकि संभल हिंसा से जुड़े मामलों में उसे जमानत मिल चुकी है। बताया जा रहा है कि बहुत जल्द राज्य सरकार पुर्विचार याचिका दायर करेगी। ये आदेश न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और शील नागू की पीठ ने हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ दाखिल मुल्ला अफरोज की अपील पर दिया है।
13 अक्टूबर 2025 को जारी हुआ था आदेश
मुल्ला के खिलाफ प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश 13 अक्टूबर 2025 को जारी हुआ था और 28 नवंबर 2025 को एक साल की अवधि के लिए इसकी पुष्टि की गई थी यह अवधि भी जल्दी ही खत्म होने वाली थी।
कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता की आजादी को काफी अवरुद्ध हुई है जबकि उसे उस घटना से जुड़े सभी मामलों में जमानत मिल गई थी जिनमें वो आरोपी था। पर इस पूरे मामले ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया कि पुलिस ने तत्परता से केस क्यों नहीं बनाया।
कोर्ट ने कहा कि सिर्फ कस्टडी में लिए गए बयान से रासुका का आधार नहीं बनता है। जाहिर तौर पर इतने दिनों में पुलिस को यह साबित करना था कि उसके बाहर होने से भविष्य में खतरा है। खासतौर पर तब जबकि अफरोज का इतिहास इसकी गवाही देता है।
कोर्ट ने फैसले में राज्य सरकार की प्रिवेंटिव डिटेंशन की शक्ति को मान्यता देते हुए कहा कि प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) के मामलों में राज्य को मिली शक्तियां बहुत व्यापक हैं। साथ ही ऐसी शक्तियां व्यक्तिगत आजादी को कम करने की इजाजत देती हैं, न कि इसलिए कि क्या किया गया है, बल्कि इसलिए कि भविष्य में क्या किये जाने की आशंका है।
राज्य सरकार की ओर से हिरासत के आधारों में सीसीटीवी फुटेज, वीडियो रिकार्डिंग आदि के सबूत पेश किये लेकिन कोर्ट ने कहा कि ये सामग्री अपीलकर्ता को नहीं दी गई थी। कोर्ट ने ये भी कहा कि सीसीटीवी फुटेज और वीडियो रिकार्डिंग का रिकार्ड उसी समय सुरक्षित और प्रमाणित किया जाना चाहिए था।
हिरासत में लिए गए व्यक्ति की घटना से संबंधित कोई बड़ी या छोटी भूमिका थी और जांच एजेंसी के पास ऐसे सीसीटीवी फुटेज और वीडियो रिकार्डिंग थी, तो यह समझ से परे है कि पहली एफआइआर दर्ज होने के 54 दिनों के बाद तक जांच एजेंसी ने उसे गिरफ्तार क्यों नहीं किया। हमने यह पूछा था लेकिन कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
