जोधपुरी बांधेज से राजस्थानी-गुजराती छाप तक, PM मोदी की पगड़ियों में दिखे सांस्कृतिक विरासत के रंग
स्वतंत्रता दिवस पर पीएम मोदी की पगड़ियां भारत की सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक बन गई हैं, जो 2014 में जोधपुरी बांधेज से शुरू होकर हर साल नए रंग और डिजाइन दिखाती हैं।

PM मोदी की पगड़ियों में दिखे सांस्कृतिक विरासत के रंग। (X- @BJP4India)
HighLights
पीएम मोदी की पगड़ियां भारत की विविधता का प्रतीक।
2014 में जोधपुरी बांधेज से हुई शुरुआत।
हर साल दिखते हैं राजस्थानी-गुजराती बांधेज जैसे नए रंग।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। स्वतंत्रता दिवस का दिन सिर्फ तिरंगे, राष्ट्रगान और लाल किले की प्राचीर से दिए जाने वाले भाषण का दिन नहीं है। यह उन रंगों और परंपराओं का भी उत्सव है, जिनसे मिलकर भारत की पहचान बनी है। शायद यही वजह है कि हर साल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब लाल किले की प्राचीर पर पहुंचते हैं तो उनके भाषण के साथ उनकी पगड़ी भी लोगों का ध्यान खींचती है।
2014 में जोधपुरी बांधेज पगड़ी से शुरू हुआ यह सिलसिला अब एक ऐसी दृश्य परंपरा बन चुका है, जिसमें देश की विविधता के रंग साफ दिखाई देते हैं।
12 साल बाद, देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर पीएम मोदी ने एक बार फिर अपनी पोशाक के जरिये इसी सांस्कृतिक विरासत को सामने रखा। इस बार उनकी पगड़ी में राजस्थानी और गुजराती बांधेज की छाप दिखाई दी।
सफेद कुर्ते के ऊपर चॉकलेट-ब्राउन जैकेट और उस पर तिरंगे की झलक देती केसरिया, सफेद और हरे रंग की पट्टियों ने उनके पहनावे को राष्ट्रीय रंगों से जोड़ दिया।
पिछले वर्षों में स्वतंत्रता दिवस पर पीएम मोदी की पगड़ियां उनकी खास पहचान बन चुकी हैं। इन पगड़ियों में कभी राजस्थान की लहरिया और बांधनी नजर आई तो कभी देश के दूसरे हिस्सों की रंग-बिरंगी पारंपरिक छवियां। हर साल रंग, डिजाइन और बांधने का अंदाज बदलता रहा, लेकिन संदेश लगभग एक ही रहा—भारत की विविधता ही उसकी खूबसूरती है।
2015 में उन्होंने पीले और कई रंगों वाली क्रिस-क्रास डिजाइन की पगड़ी पहनी। 2016 में हल्के गुलाबी और पीले रंग का टाई-एंड-डाई डिजाइन नजर आया। 2017 में गहरे लाल और पीले रंग का पारंपरिक संयोजन दिखा।
2018 में केसरिया रंग प्रमुख रहा, जबकि 2019 में भी भारतीय रंगों और पारंपरिक शैली को जगह मिली।कोरोना महामारी के बीच 2020 में इस परंपरा में बदलाव दिखा। पीएम ने केसरिया बार्डर वाला सफेद स्कार्फ पहना, जो चेहरे को ढकने के काम भी आया।
2021 में क्रीम और केसरिया रंग की वापसी हुई और आधी बाजू के कुर्ते के साथ इसे जोड़ा गया। 2022 में लाल डिजाइन और लंबे लटकते सिरों वाली केसरिया पगड़ी नीली जैकेट के साथ नजर आई।2023 में पीले, हरे और लाल रंग की बांधनी ने पहनावे में नई चमक जोड़ी। 2024 में बहुरंगी पगड़ी और 2025 में नारंगी, पीले और हरे रंगों वाली राजस्थानी लहरिया पगड़ी ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
इस साल गहरे लाल रंग की बांधेज पगड़ी की वापसी ने जैसे इस सफर को एक भावनात्मक पूर्णता दी। 2014 में जिस जोधपुरी बांधेज से यह सिलसिला शुरू हुआ था, 12 साल बाद उसी परंपरा की गूंज फिर सुनाई दी। रंग बदले, डिजाइन बदले और वक्त भी बदला, लेकिन लाल किले की प्राचीर से भारत की सांस्कृतिक विविधता को रंगों में पिरोने की यह परंपरा लगातार जारी रही।
(समाचार एजेंसी आईएएनएस के इनपुट के साथ)

