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    एक लाख से ज्यादा स्कूलों में बिजली नहीं, 98500 में लड़कियों के लिए टॉयलेट नहीं; नीति आयोग की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

    Updated: Thu, 07 May 2026 08:32 PM (IST)

    नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो दशकों में सरकारी स्कूलों में दाखिले में 22% की गिरावट आई है, जो 2005 के 71% से घटकर 2024-25 में 49.24% हो गया ...और पढ़ें

    सरकारी स्कूल में पढ़ती छात्राएं

    सरकारी स्कूल में पढ़ती छात्राएं

    HighLights

    1. सरकारी स्कूलों में 22% दाखिले की गिरावट दर्ज।

    2. नीति आयोग ने निजी शिक्षा की गुणवत्ता पर चिंता जताई।

    3. एक लाख से अधिक स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे।

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। प्राइवेट स्कूलों की चकाचौंध में सरकारी स्कूलों की पूछ कम होती जा रही है। अपने बच्चों के बेहतर भविष्य की चिंता में माता-पिता सरकारी स्कूलों की जगह प्राइवेट स्कूलों को महत्व दे रहे हैं। नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट से कुछ ऐसी ही बातें सामने आई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो दशकों में सरकारी स्कूलों में दाखिले में करीब 22 प्रतिशत की गिरावट आई है।

    2005 में जहां 71 प्रतिशत दाखिले सरकारी स्कूलों में होते थे, वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा घटकर 49.24 प्रतिशत रह गया।भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली पर नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है कि अब सभी माध्यमिक संस्थानों में प्राइवेट स्कूलों की हिस्सेदारी 44.01 प्रतिशत हो गई है, जो निजी शिक्षा की ओर अभिभावकों के झुकाव को दर्शाता है।

    नीति आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के 98,592 स्कूलों में लड़कियों के लिए चालू हालत में टॉयलेट नहीं हैं, जबकि 61,540 स्कूलों में कोई भी इस्तेमाल लायक टॉयलेट नहीं है। इसी तरह, रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले दस सालों में स्कूलों में बिजली की पहुंच 55 प्रतिशत से बढ़कर 91.9 प्रतिशत हो गई है। फिर भी, 1.19 लाख स्कूलों में अभी भी चालू हालत में बिजली नहीं है।

    समानता पर नीति आयोग की चिंता

    रिपोर्ट के अनुसार, यह बदलाव उस धारणा से प्रेरित है कि प्राइवेट स्कूल में बेहतर अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा, कड़ा अनुशासन और भविष्य में रोजगार के अच्छे अवसर मिलते हैं। रिपोर्ट इस बात से आगाह भी करती है कि इस तरह की उम्मीदें हमेशा जमीनी परिणामों से मेल नहीं खाती हैं।

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    नीति आयोग ने कहा, 'भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली में, खासतौर पर माध्यमिक स्तर पर, निजी संस्थानों की ओर एक उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है। यह बदलाव बेहतर परिणामों के लिए अभिभावकों की आकांक्षाओं को दर्शाता है, लेकिन शिक्षा में प्राइवेट सेक्टर की इस तेज बढ़ोतरी ने गुणवत्ता, समानता ओर नियमन को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।'

    पांचवीं के 35त्‍‌न छात्र नहीं पढ़ पाते किताबरिपोर्ट बताती है कि कम शुल्क वाले प्राइवेट (एलएफपी) स्कूलों की स्थिति चिंताजनक है। यहां कक्षा पांचवीं के 35 प्रतिशत छात्र कक्षा दो की किताब भी पढ़ नहीं पाते, जबकि 60 प्रतिशत छात्र बुनियादी भाग का सवाल हल नहीं कर पाते, जो कई निजी संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता पर को लेकर चिंता पैदा करता है।

    प्राइवेट स्कूलों को ऐसा है हाल

    रिपोर्ट के अनुसार, कई एलएफपी स्कूल शिक्षा के अधिकार (आरटीई) अधिनियम के तहत बुनियादी मानकों को पूरा नहीं करते। वहां शौचालय, खेल के मैदान और स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। ऐसे स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती अक्सर अनौपचारिक होती है। उन्हें कम वेतन और नौकरी की सुरक्षा के बगैर काम करना पड़ता है, जिसका सीधा असर पढ़ाई की गुणवत्ता पर पड़ता है।

    एक लाख स्कूल एक शिक्षक के भरोसे

    रिपोर्ट ने देश के शिक्षण कार्यबल में व्यापक चुनौतियों को भी उजागर किया। देशभर में लगभग 14 लाख स्कूलों में करीब 1.01 करोड़ शिक्षक कार्यरत हैं। छात्र-शिक्षक अनुपात में सुधार के बावजूद कई ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में शिक्षकों की कमी है। देश में एक लाख से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं, जो केवल एक-एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं।