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विदेशों में घट रही आबादी, भारतीय युवाओं के लिए खुला ग्लोबल नौकरियों का सुनहरा मौका; पढ़ें पूरी रिपोर्ट

Published: Wed, 08 Jul 2026 05:11 PM (IST)Updated: Wed, 08 Jul 2026 05:29 PM (IST)

Global Job Boom for Indian Youth: भारतीय युवाओं के लिए वैश्विक नौकरियों के बड़े अवसर हैं, विकसित देशों में घटती ...और पढ़ें

दुनिया भर में बढ़ेगी हमारे प्रशिक्षित युवाओं की मांग; पढ़ें रिपोर्ट। ग्राफिक्‍स- एआई जेनरेटेड

दुनिया भर में बढ़ेगी हमारे प्रशिक्षित युवाओं की मांग; पढ़ें रिपोर्ट। ग्राफिक्‍स- एआई जेनरेटेड

HighLights

  1. विकसित देशों में घटती आबादी से भारतीय युवाओं को अवसर।

  2. भारत का रेमिटेंस 2029 तक 160 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान।

  3. कौशल उन्नयन और विदेशी भाषा ज्ञान वैश्विक मांग के लिए आवश्यक।

जागरण टीम, नई दिल्‍ली। अमेरिका, यूरोप और जापान सहित अग्रणी अर्थव्यस्थाएं लंबे समय से दुनिया भर के प्रशिक्षित और प्रतिभाशाली कामगारों को आकर्षित करती रहीं हैं। नीति आयोग के मुताबिक 2029 तक भारत का रेमिटेंस बढ़ कर 160 अरब डालर तक पहुंच सकता है।

ऐसे दौर में जब विकसित देशों में प्रजनन दर लगातार घट रही है ,एक बड़ी युवा श्रम शक्ति के साथ भारत दुनिया की मदद कर सकता है। इसीलिए भारत ने कई देशों के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों में भारतीय कामगारों की आवाजाही को आसान बनाने के प्रविधान भी किए हैं।

इस बीच अमेरिका सहित कुछ देशों में संरक्षणवाद बढ़ रहा है और स्थानीय सरकारें चाहती हैं कि उनके नागरिकों को ज्यादा नौकरियां मिलें। इन चुनौतियों के बीच प्रशिक्षित कामगारों की वैश्विक मांग में एक बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने के लिहाज से चुनौतियां क्या हैं और हमारे युवा इसके लिए किस हद तक तैयार हैं, इसकी पड़ताल प्रासंगिक है...

भारतीय प्रतिभा का बढ़ता मूल्य

वेतन में बढ़त 

1,40,000 डॉलर औसत वेतन के साथ स्थानीय नागरिकों के औसत वेतन से 3 अधिक हो गई है अमेरिकी में भारतीय मूल-1B धारकों का औसत वेतन

बढ़ता प्रवासन

14 लाख से अधिक लोग और 13 लाख से अधिक छात्र बेहतर अवसरों के लिए जा रहे हैं विदेश

24% की सालाना वृद्धि देखी गई है खाड़ी देशों में भी कुशल ट्रेंड्स की मांग में

भारतीय युवा मौके का कैसे फायदा उठाएं?

  • लगातार स्किल अपग्रेड: पारंपरिक डिग्री के बजाय व्यावहारिक कौशल पर ध्यान दें। एआई, डेटा साइंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में सर्टिफाइड कोर्स/प्रशिक्षण हासिल करें।
  • व्यावसायिक ट्रेंड्स का आधुनिकीकरण: वेल्डिंग, इलेक्ट्रिकल वर्क, प्लंबिंग और कंस्ट्रक्शन जैसे सेक्टर्स में आधुनिक तकनीकों (जैसे- ऑटोमेशन और स्मार्ट ग्रिड) को सीखकर सर्टिफाइड स्किल वर्कर बनें। विदेशों में इन सेक्टर्स में भारी कैरियर विकल्प मिल रहे हैं।
  • विदेशी भाषा का ज्ञान: केवल तकनीकी ज्ञान काफी नहीं है। विदेशों में काम करने के लिए अंग्रेजी के साथ-साथ जर्मन, जापानी या मंदारिन जैसी भाषाओं को सीखना युवाओं के लिए नए द्वार खोल सकता है।
  • गवर्नमेंट स्कीम्स का लाभ: स्किल इंडिया डिजिटल और विभिन्न देशों के साथ हुए मोबिलिटी पार्टनरशिप एग्रीमेंट्स का लाभ उठाकर विदेशी बाजारों तक पहुंच बढ़ाएं।

मानव पूंजी से समृद्ध देशों की होगी इक्कीसवीं सदी

समग्र विकास विशेषज्ञ प्रो. विकास सिंह बताते हैं कि साल 2025 में, विदेशों में काम करने वाले भारतीयों ने स्वदेश में अनुमानित 140 अरब डालर की धनराशि यानी रेमिटेंस भेजी, जो इतिहास में किसी भी देश द्वारा प्राप्त की गई अब तक की सबसे बड़ी राशि है। यह आंकड़ा हंगरी और कुवैत जैसे देशों के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से भी अधिक है। यह भारत के वार्षिक सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च से ज़्यादा है, और देश के सबसे बड़े व्यापारिक निर्यात क्षेत्रों की बराबरी करता है।

इसके बावजूद, भारत अपने वैश्विक प्रतिभा नेटवर्क को एक रणनीतिक आर्थिक संपत्ति के बजाय प्रवासन के एक सह-उत्पाद के रूप में देखता आ रहा है। रेमिटेंस को अक्सर परिवार के सदस्यों के बीच होने वाले निजी लेनदेन के रूप में खारिज कर दिया जाता है। वास्तव में, यह पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आवास और उद्यमिता को वित्तपोषित करता है, साथ ही विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करता है और बाहरी कमजोरियों को कम करता है।

भारत का प्रवासी समुदाय असाधारण पैमाने पर एक अनौपचारिक आर्थिक स्थिरता प्रदाता बन गया है। दशकों तक, भारत के प्रवासन की कहानी मुख्य रूप से खाड़ी देशों की कहानी थी।

लाखों श्रमिकों ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी अर्थव्यवस्थाओं की यात्रा की, जिससे उन्होंने स्वदेश में अपने परिवारों का भरण-पोषण किया और साथ ही आधुनिक पश्चिम एशिया के निर्माण में मदद की। वह मॉडल आज भी महत्वपूर्ण बना हुआ है। लेकिन अब, भारत न केवल श्रम, बल्कि विशेषज्ञता का भी निर्यात कर रहा है।

बीसवीं सदी उन देशों की रही जिनके पास भौतिक संपत्ति और खनिज संसाधन थे। इक्कीसवीं सदी उन देशों की हो सकती है जो मानव पूंजी से समृद्ध हैं और इसका प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करते हुए आर्थिक क्षमता को मजबूत करेंगे। - प्रो. विकास सिंह, विशेषज्ञ, समग्र विकास

आज, भारत में आने वाले रेमिटेंस में सबसे बड़ी हिस्सेदारी अमेरिका की है। ब्रिटेन, कनाडा, आस्ट्रेलिया और सिंगापुर इसके तेजी से बढ़ते और महत्वपूर्ण स्रोत बन गए हैं। प्रवासी का प्रोफाइल अब मजदूर से बदलकर पेशेवर हो गया है। यानी निर्माण क्षेत्र के श्रमिक से लेकर साफ्टवेयर इंजीनियर, चिकित्सक, शोधकर्ता और उद्यमी तक।

विकसित दुनिया आर्थिक इतिहास में अभूतपूर्व गति से बूढ़ी हो रही है। अधिकांश उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे गिर गई है।

Labour in india inside

जर्मनी कुशल श्रमिकों की कमी का सामना कर रहा है। जापान की जनसंख्या सिकुड़ रही है। यूरोप में देखभाल करने वालों की कमी है। उत्तरी अमेरिका में विशेषज्ञ प्रतिभाओं का अभाव है। इस बीच, भारत दुनिया की सबसे युवा प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। अगले दो दशकों में भारत अपने कामकाजी उम्र के नागरिकों में लाखों की संख्या जोड़ना जारी रखेगा।

भारत हर साल लाखों स्नातक तैयार करता है। फिर भी नियोक्ता लगातार नौकरी के लिए तैयार प्रतिभाओं की कमी बताते हैं। चुनौती अब केवल शिक्षा की नहीं है, यह मानकीकरण, प्रमाणन और वैश्विक रोजगार क्षमता की है। बीसवीं सदी उन देशों की थी जिन्होंने भौतिक पूंजी में महारत हासिल की। इक्कीसवीं सदी उन देशों की हो सकती है जो मानव पूंजी में महारत हासिल करेंगे। यहां भारत के पास शानदार मौका है।

पासपोर्ट से जाएगा भारत का अगला बड़ा निर्यात

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्‍थापक अजय श्रीवास्तव का कहना है कि श्रमिक गतिशीलता (वर्कर मोबिलिटी) भारत के सबसे बड़े वैश्विक आर्थिक अवसरों में से एक बनती जा रही है। उम्र दराज होती आबादी, नई तकनीकें और बढ़ती बुनियादी ढांचागत जरूरतें विकसित और खाड़ी देशों में श्रमिकों की कमी पैदा कर रही हैं।

इससे भारतीय पेशेवरों, तकनीशियनों और कम कुशल श्रमिकों के लिए बड़े अवसर पैदा हो सकते हैं, जिससे विदेशी रोजगार भारत की अर्थव्यवस्था और वैश्विक उपस्थिति के लिए लगातार महत्वपूर्ण हो जाएगा।

दुनिया में भारतीय प्रतिभा की मांग कितनी पहुंची?

एक करोड़ 80 लाख से अधिक भारतीय विदेश में रहते हैं, जबकि व्यापक प्रवासी आबादी तीन करोड़ 50 लाख से अधिक है। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और ओमान जैसे खाड़ी देश शहरों, हवाई अड्डों, सड़कों, होटलों, अस्पतालों और सेवा उद्योगों के निर्माण और उन्हें चलाने के लिए भारतीय प्रवासी श्रमिकों पर बहुत अधिक निर्भर हैं।

भारत के पास मानव पूंजी की संपदा है। अगर वह सही नीतियां बना कर युवाओं को अंतरराष्ट्रीय बाजार की मांग के हिसाब प्रशिक्षण देता है तो उसका अगला बड़ा निर्यात कंटेनरों से नहीं जाएगा। इसके बजाए यह कौशल, प्रमाणपत्र और पासपोर्ट के साथ यात्रा करेगा। - अजय श्रीवास्तव, संस्थापक, ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव

अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाएं तेजी से भारतीय डाक्टरों, नर्सों, इंजीनियरों, शोधकर्ताओं और प्रौद्योगिकी पेशेवरों पर निर्भर हो रही हैं। भारत अपने मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) के माध्यम से कुशल पेशेवरों की आवाजाही को बढ़ावा दे रहा है।

भारत-सिंगापुर सीईसीए ने नर्सिंग योग्यताओं की मान्यता का समर्थन किया।

Labour in forien graphics

किन देशों के साथ हुए समझौते पहुंचा रहे सीधे फायदा?

भारत-जापान सीईपीए ने अंग्रेजी, योग, भारतीय व्यंजन, शास्त्रीय संगीत और नृत्य में भारतीय शिक्षकों और प्रशिक्षकों के लिए अवसर खोले। भारत-आस्ट्रेलिया ईसीटीए ने मेट्स योजना बनाई, जो युवा भारतीय पेशेवरों के लिए हर साल 3,000 स्थान (सीटें) प्रदान करती है।

कोरिया, मलेशिया और संयुक्त अरब अमीरात के साथ समझौतों में व्यावसायिक आगंतुकों, पेशेवरों और कंपनियों के भीतर ट्रांसफर किए गए कर्मचारियों के लिए भी प्रविधान शामिल हैं। वहीं, भारत-यूके एफटीए दोहरे सामाजिक-सुरक्षा भुगतान की समस्या को हल करता है।

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