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    यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 21, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

    खुशहाल परिवार की संस्कृति को बचाना होगा, एकाकी जीवन में असली खुशी नहीं

    By TilakrajEdited By:
    Updated: Thu, 21 Jul 2022 09:50 AM (IST)

    देश में ओल्ड एज होम की बढ़ती संख्या इशारा कर रही है कि भारत में परिवारों को बचाने के लिए एक स्वस्थ सामाजिक परिप्रेक्ष्य की नितांत आवश्यकता है। अनुभव क ...और पढ़ें

    पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बढ़ने, शहरीकरण बढ़ने के कारण देश में परिवार संस्था का क्षरण हो रहा
    पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बढ़ने, शहरीकरण बढ़ने के कारण देश में परिवार संस्था का क्षरण हो रहा

    नई दिल्‍ली, देवेंद्रराज सुथार। प्रतिवर्ष 21 जुलाई को खुशहाल परिवार दिवस के रूप में मनाया जाता है। परिवार एक ऐसी सामाजिक संस्था है, जो आपसी सहयोग और समन्वय से क्रियान्वित होती है और जिसके समस्त सदस्य आपस में मिलकर अपना जीवन प्रेम तथा स्नेह पूर्वक निर्वाह करते हैं। संस्कार, मर्यादा, सम्मान, समर्पण, आदर, अनुशासन आदि किसी भी सुखी-संपन्न एवं खुशहाल परिवार के गुण होते हैं। कोई भी व्यक्ति परिवार में ही जन्म लेता है, उसी से उसकी पहचान होती है और परिवार से ही अच्छे-बुरे लक्षण सीखता है।

    परिवार सभी लोगों को जोड़े रखता है और दुख-सुख में सभी एक-दूसरे का साथ देते हैं। कहते हैं कि परिवार से बड़ा कोई धन नहीं होता हैं, पिता से बड़ा कोई सलाहकार नहीं होता हैं, मां के आंचल से बड़ी कोई दुनिया नहीं, भाई से अच्छा कोई भागीदार नहीं और बहन से बड़ा कोई शुभ चिंतक नहीं होता। इसलिए परिवार के बिना जीवन की कल्पना करना कठिन है। एक अच्छा परिवार बच्चे के चरित्र निर्माण से लेकर व्यक्ति की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    किसी भी सशक्त देश के निर्माण में परिवार एक आधारभूत संस्था की भांति होता है, जो अपने विकास कार्यक्रमों से दिनोंदिन प्रगति के नए सोपान तय करता है। कहने को तो जीव जगत में परिवार एक छोटी इकाई है, लेकिन इसकी मजबूती हमें हर बड़ी से बड़ी परेशानी से बचाने में कारगर है। परिवार से इतर व्यक्ति का अस्तित्व नहीं है। लोगों से परिवार बनता है और परिवार से राष्ट्र और राष्ट्र से विश्व बनता है। इसलिए कहा भी जाता है ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ अर्थात पूरी पृथ्वी हमारा परिवार है। ऐसी भावना के पीछे परस्पर वैमनस्य, कटुता, शत्रुता और घृणा को कम करना है।

    हालांकि, पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बढ़ने, शहरीकरण बढ़ने के कारण देश में परिवार संस्था का क्षरण हो रहा है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। एकल परिवारों का चलन बढ़ रहा है। इसके चलते आधुनिक पीढ़ी का अपने बुजुर्गों और अभिभावकों के प्रति आदर कम होने लगा है। वृद्धावस्था में अधिकतर बीमार रहने वाले माता-पिता अब उन्हें बोझ लगने लगे हैं। वे अपने संस्कारों और मूल्यों से कटकर एकाकी जीवन को ही अपनी असली खुशी और आदर्श मान बैठे हैं।

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    देश में ओल्ड एज होम की बढ़ती संख्या इशारा कर रही है कि भारत में परिवारों को बचाने के लिए एक स्वस्थ सामाजिक परिप्रेक्ष्य की नितांत आवश्यकता है। अनुभव का खजाना कहे जाने वाले बुजुर्गों की असली जगह वृद्धाश्रम नहीं, बल्कि घर है। ऐसा कौन-सा घर परिवार है जिसमें झगड़े नहीं होते? लेकिन यह मनमुटाव तक सीमित रहे तो बेहतर है। मनभेद कभी नहीं बनने दिया जाए। बुजुर्ग वर्ग को भी चाहिए कि वह नए जमाने के साथ अपनी पुरानी धारणाओं को परिवर्तित कर आधुनिक परिवेश के मुताबिक जीने का प्रयास करें।

    (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)